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Monday, April 13, 2026

स्वर्ण भस्म -5 ( बसंत कुसुमाकर रस )

“स्वर्ण भस्म” भाग -5

बसंत कुसुमाकर रस ( स्वर्ण भस्म युक्त )

★Special For Diabetes ★
मधुमेह रोगियों के लिए तोहफा 
 सिद्ध योग संग्रह ग्रंथ से ....

बहुत समय से मेरे पाठको की मांग थी कि वैद्य अमनदीप सिंह चीमा जी , शूगर के लिए भी अच्छी दवा बताएं , बहुत प्रसन्नता महसूस कर रहा हुँ , आपसे यह दवा शेयर करते हुए ......

यूँ तो यह बसंत कुसुमाकर रस,  बना बनाया बाजार से मिल जाता है लेकिन 50% तक भी रिज्लट नही दे पाता ।‌

अगर आप आयुर्वेद जानते है या किसी आयुर्वेद वैद्य के संपर्क में है तो उनसे ही बसंत कुसुमाकर रस बनवा कर  प्रयोग करें , इसमें पड़ने वाली भस्मे उत्तम कवालिटी की होनी चाहिए ....
 बसंत कुसुमाकर रस कई सालों से मैं निर्माण खुद कर रहा 101% प्रभावी है | 

नुस्खा - 
प्रवाल भस्म ( मैं पिष्टी डालता हुं ) , 
रस सिन्दूर ( मैं सिद्ध मकरध्वज डालता हुं ) 
मोती पिष्टी या भस्म ( मैं पिष्टी डालता हुं ) , 
अभ्रक भस्म  सहस्त्र , प्रत्येक 40-40 ग्राम  , 
रोप्य ( चांदी ) भस्म , 
स्वर्ण भस्म 20-20 ग्राम,  
लौह भस्म , नाग भस्म , बंग भस्म
 30-30 ग्राम लेकर सबको पत्थर के खरल में डालकर 
अडूसे के पत्तों का रस , 
हल्दी का रस , 
गन्ने का रस , 
कमल के फूलों का रस , 
मालती के फूलों का रस , 
शतावरी का रस , 
केले के कन्द का रस , 
और चन्दन भिगोया हुआ जल या क्वाथ 
प्रत्येक की सात - सात भावना दें मतलब रस में घोट लें।

 प्रत्येक भावना में छे - सात घण्टे घोट लें ।अन्त की भावना में उसमें दो तोला अच्छी कस्तूरी और अम्बर दो तोला मिलाकर 3 घण्टा मर्दन करना चाहिए । फिर जब गोली बनाने लायक हो जाए तो 125mg की गोलियां बना लें ।‌ गोली लाल रंग में बनती है। 

{{ अंबर हमें मिल जाता है , लेकिन कस्तूरी आजकल न मिलने की वजह से हम नहीं डाल रहे।जब मिलने लगेगी तो डालेंगे । Ban होने की वजह से व्यापारी महंगी भी बेचते हैं। यह सबसे बड़ा कारण है। कस्तूरी की जगह हम अन्य घटक डाल रहे हैं। लता कस्तूरी नहीं। इसके स्थान अन्य द्रव्य भी डाले जा सकते हैं।‌ 
आयुर्वेद में बहुत ऐसी दवाएं हैं , जो किसी कारण Ban  🚫 हैं, जैसे हाथी दांत , कस्तूरी, बारहसिंगा .... }}

 गोली बनाकर छाया में सुखाकर रख लो । यही है “बसंत कुसुमाकर रस” 

अब आप खुद अंदाजा लगा लो, कि इतनी मेहनत कोन कंपनी करती है। जो वैद्य इतनी मेहनत से तैयार कर सकते हैं। रिजल्ट भी तो उन्हीं को मिलते हैं। 

मात्रा - 1-2 गोली ।‌ विशेष अनुपान से। 

अब आप लोगों को खुद ही अंदाजा हो गया होगा कि इसमें पड़ने वाली हर चीज लाजवाब और असरकारक है | गुण देखकर लगाए पैसे भूल जाते है | मैंने इसके साथ अन्य औष्धियों का मिश्रण करके बहुत से रोग जैसे बुढ़ापे की कमजोरी , बाल काले , दिमाग के रोग , हार्ट कमजोरी , नपुंसकता , जोड़ो का दर्द , पक्षाघात , बे-औलाद पन आदि रोगों में अन्य दवायों के मिश्रण करके लाभ पहुंचाया है | 

‘बसंत कुसुमाकर रस’ रसायन गुणों से भरपूर और मधूमेह की महोष्धि है । 

नीचे एक नुस्खा आपसे साझा कर रहा हुं, जो मधुमेह और मधुमेह की वजह से आई कमजोरी, मर्दाना कमजोरी के लिए बहुत लाभदायक है। 

★मधुमेह,डायबिटीज़ Diabetes★

“गागर में सागर" जैसा है  “मेरा अनुभूत नुस्खा"

4-5 महीने के प्रयोग करने से,  मधुमेह कैसी भी,कितनी भी पुरानी हो ठीक हो जाएगी । इससे इंसुलिन भी छूट जाएगा। 

*नुस्खा इस प्रकार है 

•जामुन बीज 10 ग्राम,
•एलुवा -5 ग्राम,
•त्रिकुटा 5 ग्राम,
•बूटी गुडमार 10 ग्राम,
•शु शिलाजीत 5 ग्राम,
•बसंत कुसमाकर रस 7.5 ग्राम,
•तूफानी ताकत महायोग 60 गोली 

एक गोली सुबह, एक गोली शाम को 
उस हिसाब से बसंत कुसुमाकर रस ( गोली ) 60 नुस्खे में जाएगा , जिसका वजन 125mg ×60 गोली  = 7.5gm है। 

*बनाने की विधि*
इन सबको पीसकर ग्वारपाठा रस में घोटकर 60 गोली बनाकर सुखाकर रख लें । सुबह-शाम एक गोली दूध से लें ।
साथ में तूफानी ताकत महायोग एक गोली ‌।

•विशेष •
इस दवा की जितनी तारीफ की जाए कम है । एक महीने में आपके शरीर में नई जान डाल देगी ।  जिन लोगों की शूगर के कारण मर्दाना ताकत खत्म हो चुकी है , इससे खोई हुई दुबारा वापस लौट आएगी। इस दवा में शिलाजीत, बसंत कुसमाकर रस,मकरध्वज , अंबर, स्वर्ण भस्म जैसी अति बहुमूल्य औष्धियों को मिलाकर बनाया गया है । जो कि बहुत गुणकारी है। आयुर्वेद की थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले इनके गुणों से भलीभांति जानते है। आप इनके गुणों को जानने के लिए आयुर्वेद का अध्यन कर सकते है । शूगर जैसी नामुराद बिमारी को जड़ से उखाड़ने के लिए यह मेरा खुद का फार्मूला  है,और कई रोगियों पर सफलता से आजमाया हुआ है।यह नुस्खा आपको किसी किताब में नही मिलेगा । यह सब औष्धियों के गुणों को देखते हुए मेरी स्वयं की ही खोज है । आज तक आप जितने भी (  मेरे अनुभूत नुस्खे ) पढ़ चुके है सब मेरी अपनी ही वर्षों की खोज से निकले है । 
सिर्फ मर्दाना ताकत के लिए आप बसंत कुसुमाकर रस को तूफानी ताकत महायोग के साथ इस्तेमाल कर सकते हैं। 

*सदैव आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा ,
अमन आयुर्वेद, Dasuya,पंजाब
Call & WhatsApp 09915136138

मुझे पता है आप पूछेंगे, यह तूफानी ताकत महायोग गोली क्या है। यह भी स्वर्ण भस्म युक्त है। इसलिए इसका लेख अगले भाग में आपसे शेयर करुंगा। 

मिलता हुं अगले लेख में...... 

#VaidAmanCheema #AmanAyurved #diabeteskidawa_ #ayurved #ayurvedic

Wednesday, April 30, 2025

Swarn Bhasma - Part -6

“स्वर्ण भस्म” -भाग -6

•कामिनी-विद्रावण रस स्पेशल•
( स्वर्ण भस्म, मोती , रजत युक्त )

शीघ्रपतन का काल है यह गोली~
मार्केट से आपको सिर्फ साधारण वाला कामिनी विंद्रावन रस ही मिलेगा, जो कि हमारे कामिनी विंद्रावन रस के मुकाबले न्यून गुण है।
 कामिनी विंद्रावन रस स्पेशल में हमने अपने अनुभव से मोती पिष्टी, प्रवाल पिष्टी, रजत भस्म ( चांदी भस्म) मिलाई है , जो कि पित्त को ठीक करती है। फार्मूले की तासीर को बेलेंस रखती है।
 इसे सभी तासीर वाले लें सकते हैं। हर मौसम में ले सकते हैं। इसमें चंदन भी डाला गया है जो कि बहुत ठंडी तासीर का होता है। बाकी चीजें गर्म तासीर की हैं । 
कुल मिलाकर यह नुस्खा न गर्मी करता है , न ठंड। हर कोई, गर्म ठंडी तासीर वाला बिना डर हर मौसम में इसे ले सकता है ‌। 
इसकी ताकत बढ़ाने के लिए हमने इसमें स्वर्ण भस्म भी मिलाया है। 

घटक -
अकरकरा, 
सोंठ, 
लौंग, 
केशर, 
पीपल, 
जायफल, 
जावित्री, 
प्रवाल पिष्टी,
चन्दन प्रत्येक 1-1ग्राम, 

शुद्ध सिंगरफ ¼ग्राम,
शुद्ध गन्धक ¼ग्राम,
रजत भस्म -¼ग्राम,
मोती पिष्टी -¼ग्राम,
स्वर्ण भस्म -¼ग्राम,
और शुद्ध अफीम “अकरकरा से चंदन” तक जितने घटक है , उनके बराबर मात्रा में लें।

1ग्राम = 1000mg 
¼ ग्राम = 250mg 

 प्रथम सिंगरफ, गन्धक और अफीम को एकत्र घोंट कर रखें। फिर शेष दवा को कूट, कपड़छन चूर्ण कर शीतल जल से घोंट कर मटर बराबर ( 250mg ) गोली बना, छाया में सुखा कर रख लें।

मात्रा और अनुपान-
1-1 गोली रात को सोने से एक घण्टा पूर्व दूध के साथ लें। 

गुण और उपयोग-
यह वीर्य को गाढ़ा कर स्तम्भन करता है एवं शुक्रवहा नाड़ियों को बलवान बनाता है। 

शीघ्रपतन वालों के लिये बहुत लाभदायक है, क्योंकि यह उत्तम वीर्य स्तम्भक है। 

अप्राकृतिक मैथुन अथवा हस्तमैथुन या स्वप्नदोष आदि के कारण उत्पन्न शीघ्रपतन की शिकायत तथा वीर्य के पतलेपन को मिटाने में यह रसायन बहुत श्रेष्ठ लाभदायक है ।

कामिनी विद्रावन रस शक्तिशाली जड़ी-बूटियों और खनिजों से तैयार किया गया है, जिनके बारे में पारंपरिक रूप से माना जाता है कि यह स्वस्थ शुक्राणु उत्पादन का समर्थन करते हैं और शुक्राणु की गुणवत्ता में सुधार करते हैं। यह उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपनी प्रजनन क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं।

मिलते हैं अगले लेख में.... 

✍🏻सदैव आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद - दसुआ -पंजाब 
Call & WhatsApp 099151 36138 

#kaminiVidravanRasSpecial #SwarnBhadmaPart6 #VaidAmanCheema #AmanAyurved

Thursday, April 4, 2024

स्वर्ण भस्म -भाग 4

“स्वर्ण भस्म” भाग -4

स्वर्ण भस्म का आज हम 4th भाग आपसे शेयर करने जा रहे हैं। यह रसायन स्वर्ण भस्म युक्त है। जिसका नाम है। 

“चतुर्मुख रस”

गुण और उपयोग:- 
 स्वर्ण, अभ्रक, कज्जली आदि के योग से बनने वाली यह दवा वातज रोगों के लिये बहुत फायदेमन्द है। 
मूर्च्छा, हिस्टीरिया, मृगी और उन्माद रोग पर इस दवा का अच्छा असर होता है। 
हृदय की बीमारियों को दूर करके हृदय को मजबूत करना इस रसायन का खास गुण है। 
क्षय, खाँसी, अम्लपित्त, पाण्डु और प्रसूत-ज्वर या प्रसूत के बाद होने वाली कमजोरी में इस दवा का प्रयोग करके लाभ उठाना चाहिए। 
यह पौष्टिक और रसायन भी है। इसलिये किसी बीमारी के बाद की कमजोरी या साधारणतया होने वाली कमजोरी में इस दवा से अच्छा लाभ होता है।
क्षय रोग के लिए इस दवा का सेवन आप कर सकते हैं।‌
इस रसायन का प्रमुख कार्य शारीरिक निर्बलता दूर करके सप्तधातुओं को पुष्ट करके शरीर को हष्ट-पुष्ट बनाना है। 
पाचन , पेट की गड़बड़ी,भूख न लगना, पाचन हमेशा खराब रहना , ज्वर बने रहना ऐसी समस्याएं इस रसायन के सेवन से ठीक होती है। 
बिमारी रहने के कारण रोगी कांतिहीन हो जाता है। उठने बैठने बोलने की शक्ति कम हो जाती है , ऐसे रोगियों के लिए भी यह रसायन वरदान साबित होता है। 
मानसिकत रोग, दिमाग़ी कमजोरी, bipolar disorder, पागलपन आदि के लिए यह रसायन बहुत लाभदायक है। 

घटक:- 
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लौह भस्म और अभ्रक भस्म 4-4 तोला तथा स्वर्ण भस्म 1 तोला ( 10ग्राम) लें। प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बना उसमें अन्य भस्में मिला, घृतकुमारी- रस में घोंटकर गोला बना, धूप में सुखा, एरण्ड-पत्र में लपेट, सूत से बाँध कर, धान की कोठी में तीन दिन तक रहने दें। चौथे दिन उसमें से निकाल कर महीन पीस कर 1-1रत्ती ( 125mg ) की गोली बनाकर सुखाकर रख लें।

मात्रा और अनुपान-1-2  गोली सुबह-शाम त्रिफला घृत 3ग्राम के साथ सेवन करें। ऊपर से दूध पी सकते हैं। 

इस रसायन को दूध , घी, मक्खन, मलाई,अन्य दवाओं के साथ मिलाकर, रोगी और रोग की अवस्था अनुसार वैद्य की सलाह अनुसार ही सेवन करना चाहिए। 

हम यहां आपको आयुर्वेद का ज्ञान वर्धन के लिए लेख लिख रहे हैं। कोई भी दवा चिकित्सक की सलाह से ही इस्तेमाल करें। 

इस रसायन में कज्जली योगवाही और रसायन है। 
लौह और अभ्रक शक्ति वर्धक, धातुओं को पुष्ट करने वाला, सुवर्ण राजयक्षमा, क्षय, टीबी , कमजोरी आदि के लिए सर्वश्रेष्ठ है।‌स्वर्ण जिस भी दवा में नुस्खे में हो उसके ताकत को बहुत बढ़ा देता है। 

किसी भी जटिल पुराने रोग के लिए आप मुफ्त सलाह लें सकते हैं। 
हम देश विदेश में दवा✈️📦 भेजते हैं। 

✍🏻 सदैव आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद,
Call & WhatsApp 09915136138

#SwarnBhasmaPart4 #VaidAmanCheema #AmanAyurved #ayurveda #ayurvedic

Wednesday, April 3, 2024

स्वर्ण भस्म -भाग 3

“स्वर्ण भस्म” भाग -3

स्वर्ण भस्म से संबंधित पिछले दो भाग हम लिख चुके हैं। आज तीसरे भाग में हम बात करेंगे, स्वर्ण भस्म से तैयार होने वाले “नवरत्न राज योग” के बारे में। 
पहले जानेंगे घटक , फिर मात्रा अनुपान , फिर गुण उपयोग

इस योग में स्वर्ण भस्म, हीरा भस्म, मोती भस्म, महंगे महंगे रत्न जैसे पन्ना, पुखराज ,नीलम आदि नवरत्न का का मिश्रण है। इसलिए इसका नाम नवरत्न राज योग है । जिसे रस या रसायन भी आप कह सकते हैं। आयुर्वेद में रस का मतलब तरल तो है ही। रस पारद को भी कहा गया है। जिस औषधि में पारद हो , उसके नाम के पीछे भी रस लग जाता है। रसायन औषधियों के नाम के अंत में भी रस लग जाता है। इस रस में भी शुद्ध पारद का इस्तेमाल हुआ है , इसलिए इसके नाम के पीछे रस लिखा है। हम यह दवा बनाते समय पारद के स्थान पर रस सिंदूर का इस्तेमाल करते हैं। 
इस रस में स्वर्ण भस्म, हीरा भस्म , नवरत्न आदि होने की वजह से बहुत महंगा पड़ता है। इसके लाभ देखकर खर्च किया हुआ पैसा भूल जाता है। 

★नवरत्न राज योग★
घटक-
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, स्वर्ण भस्म, रौप्य भस्म, खर्पर भस्म, वैक्रान्त भस्म, कान्त लौह भस्म, बंग भस्म, नाग भस्म, हीरा भस्म, प्रवाल भस्म, विमल भस्म, माणिक्य भस्म, पन्ना भस्म, स्वर्ण माक्षिक भस्म, रौप्यमाक्षिक भस्म, मोती भस्म, पुखराज भस्म, शंख भस्म, वैडूर्य भस्म, ताम्र भस्म, मुक्ताशुक्ति भस्म, शुद्ध हरिताल, अभ्रक भस्म, शुद्ध हिंगुल, शुद्ध मैनशिल, गोमेदर्माण भस्म या पिष्टी, नीलम भस्म- प्रत्येक १-१ भाग या 10-10 ग्राम लेकर प्रथम पारा-गन्धक की कज्जली बनावें, पश्चात् अन्य समस्त भस्मों को मिलाकर गोखरू, पान, कटेरी, गोरखमुण्डी, पीपल, चित्रकभूल छाल, ईख की जड़, गिलोय, हुरहुर, अरणी, मुनका, शतावर, कंकोल, मिर्च, कस्तूरी, नागकेशर - इन सबके क्वाथ से पृथक् पृथक् सात-सात बार भावना देकर दृढ़ मर्दन करें। फिर एक पात्त्र में सेन्धा नमक का चूर्ण भर कर उसमें मृगांक के समान कम-से-कम एक दिन की अग्नि देकर पाक करें, फिर स्वांग- शीतल होने पर औषधि को निकाल कर पूर्वोक्त द्रव्यों के रस या क्वाथ की भावना देकर मर्दन करें। सबसे अंत में इसी के समान शीतल जल के साथ कस्तूरी की भावना देकर मर्दन करें और गोली बनने योग्य होने पर 1-1रत्ती ( 125mg ) की गोली बना, छाया में सुखा कर रख लें।

यह नुस्खा रस रत्नसमुच्य ग्रंथ में है। 

मात्रा और अनुपान:- 
आधी गोली से एक गोली ( 65mg to 125mg ) ,
दूध,मलाई,शहद से , या अन्य औषधि के साथ रोगी और रोग की अवस्था अनुसार, मौसम आदि का विचार करके यह दवा का इस्तेमाल कर सकते हैं। 

गुण और उपयोग:- 
अनेक बहुमूल्य रत्नों और उपादानों से निर्मित इस रसायन का प्रयोग करने से समस्त प्रकार के शोथ,पाण्डू, बल्ड कैंसर, ल्यूकेमिया, बार बार रक्त चढ़ाने की समस्या, पुराने बुखार, वात व्याधि, मधुमेह, मधुमेह से आई नामर्दी,सभी प्रमेह ठीक होते हैं। 
मृगी, दमा ,फेफड़ों का कैंसर, दिल की कमजोरी में , मानसिक रोग , डर, तनाव , डिप्रेशन आदि , ओज बढ़ाने, शुक्राणु , शीघ्रपतन, बांझपन, सर्व कैंसर , एड्स रोगियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर बोझिल जिंदगी से ऊर्जा भरी जिंदगी प्रदान करके नई खुशियां देती है। 

इस दवा को आप 1वर्ष में 20-30 दिन सेहत तंदरुस्त रखने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं। जो लोग अच्छी सेहत चाहते है‌। उनके लिए यह महंगा टानिक ताकतवर साबित तो होता ही है, सभी रोगों से बचाव भी करता है। 

हम इसे गोली नहीं बनाते । पाउडर ही बनाकर रखते हैं। क्योंकि हर मरीज के रोग अनुसार दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर दिया जा सके। 

कीमती नवरत्नों हीरे , मोती से स्वर्ण भस्म के मिश्रण से बनी
यह दवा हर बड़ेसे बड़े रोग को ठीक करने की ताकत रखती है। 
रोग और रोगी की समस्या अनुसार, अनुपात, अनुपान हम बदलकर देते हैं। तो आशातीत लाभ मिलता है।

सदैव आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद,144205, पंजाब
Call & WhatsApp 09915136138 

#AmanAyurved #VaidAmanCheema #vaidamancheemapunjabi #NavrattanRajYog

Saturday, March 30, 2024

सत्यानाशी Argemone Mexicana

सत्यानाशी , स्वर्णक्षीरी ARGEMONE MEXICANA 

•Satyanashi Plant / आयुर्वेद में सत्यानाशी पौंधा एक बहु-उपयोगी औषधि रूप है। 
सत्यानाशी यानि कि सभी प्रकार के रोगों का नाश करने वाली वनस्पति। 
सत्यानाशी पौधा बंजर, नदी किनारे, जगलों, खाली जगहों में पाये जाते हैं। सत्यानाशी पौधा लगभग 3 फीट तक लम्बा होता है। फूल पीले और पत्ते हरे तेज नुकीले होते हैं।  बीज सरसों दानों की तरह होते हैं। कोमल पत्ते -तने तोड़़ने पर दूध जैसा तरल निकलता है। 

सत्यनाशी पौधा भारत में लगभग सभी राज्यों में पाया जाता है।

 जिसे अलग-अलग नामों 
 स्वर्णक्षीरी, कटुपर्णी, पीला धतूरा, स्याकांटा, फिरंगी धूतरा, भड़भांड़, काटे धोत्रा, मिल धात्रा, दारूड़ी, चोक, कटसी, भटकटैया पौधा, सोना खिरनी, कुश्मक, शियालकांटा, कुडियोटिट, और अंग्रेजी में Argemone mexicana, Prickly Poppy, Mexican Poppy, Satyanashi से पुकारा जाता है।

 सत्यनाशी औषधि और तेल रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

सत्यनाशी के फूल, पत्ते, दूध, जड़ें,तना, बीज औषधि के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। 

•पुराने घाव :-
चोट घाव ठीक करने में सत्यानाशी फूल, पत्तियों का रस या तैल अचूक औषधि मानी जाती है। सत्यानाशी फूल पत्तियों का रस घाव जल्दी भरने में सहायक और घाव को संक्रमित होने से बचाने में सहायक है। 

•गठिया- जोड़ों के दर्द में 
सत्यनाशी तेल में लहसुन पकाकर अच्छे से मालिश करने से गठिया जोड़ों के दर्द में फायदा होता है।

•पुरुषों महिलाओं की अंदरूनी कमजोरी दूर करे सत्यानाशी :-
पुरूर्षों महिलाओं दोनों की अन्दुरूनी गुप्त बीमारी नपुंसकता, धातुरोग, वीर्य कमजोरी, शुक्राणुओं की गड़बड़ी और निसंतान कलंक दूर करने में सत्यानाशी पौधा एक अचूक प्राचीनकालीन औषधि है। महिलाओं पुरूर्षों के गुप्त रोगों में सत्यानाशी के फूल रस, पत्तियों का रस आधा चम्मच सुबह- शाम कच्चे दूध के साथ सेवन करना फायदेमंद है। सत्यानाशी बीज तेल से मालिश और 50 ग्राम सत्यनाशी जड़ों 1 लीटर पानी में हल्की आंच में उबाल कर काढ़ा तैयार करें और रोज सुबह शाम 2-2 चम्मच पीने से जल्दी फायदा होता है। निसंतान दंम्पतियों के लिए सत्यनाशी पौधा अचूक औषधि मानी जाती है। 

 ज्यादा लाभ के लिए आप मेरे क्लीनिक पर ‌तैयार होने वाले नुस्खे जैसे:-  तूफानी ताकत महायोग, जीवन जौश महायोग , बादशाही महायोग आदि कोई एक नुस्खा डाक/कोरियर द्वारा लें सकते है। 

•लिंग कमजोरी दूर करे सत्यानाशी तेल :- 
सत्यानाशी बीज तेल मालिश पुरूर्षों की लिंग स्थिलिता, कमजोरी दूर करने में कुछ सहायक है। सत्यानाशी तेल मालिश कमजोर नसों में रक्त संचार तीब्र और सुचारू बनाये रखने में और लिंगवर्धन में सक्षम है। 
ज्यादा लाभ हेतू मेरे क्लीनिक पर तैयार  तिला मंगवा सकते है। 

सावधानियां :-
सत्यानाशी का सेवन गर्भावस्था के दौरान मना है।
गम्भीर सर्जरी में सत्यानाशी सेवन मना है।
सत्यानाशी सेवन 2 साल से छोटे बच्चों के लिए मना है।

मेरा विशेष प्रयोग :- 
सत्यानाशी का पूरा पौधा उखाड़कर धो कर साफ़ कर लें। 
कूट कर आठ गुणा पानी में डाल दें। आठ घंटे बाद लोहे या मिट्टी के बर्तन में डालकर, लकड़ी या कंडों या कोयले की धीमी आंच पर पकाएं, जब पानी आधा रह जाए तो ठंडा होने पर पानी निचोड़ लें। निचोड़ा हुआ पानी उसी बर्तन को साफ करके उसमें डालकर धीमी आंच पर पूरे पानी को सुखा दें। पानी सूखने के बाद काले रंग की गोंद जैसी दवा आपको मिलेगी। फिर इसे धीरे-धीरे खुरपे की मदद से खुरचकर मटर बराबर गोलियां बना लें। इन गोलियों को “सत्यानाशी घन वटी” बोला जाएगा। 

यह गोलियां चर्म रोग , बवासीर, मुंह के छाले, गले सड़े ज़ख्मों में , फोड़ा, कील , मुंहासे, अलर्जी, दमा , चमड़ी का कैंसर में फायदा करती है। 
ताकत बढ़ाने के लिए सत्यानाशी जड़ के काढ़े के साथ यह गोलियां इस्तेमाल करें। मर्दाना ताकत के लिए इसे और ताकतवर बनाने के लिए बंग भस्म, लौह भस्म, अभ्रक भस्म, चांदी भस्म , सोना भस्म मिला सकते हैं। 

Skin problem के लिए सत्यानाशी के बीजों का तैल इस्तेमाल करने से बहुत फायदा होता है। 

लेख अच्छा लगा तो like Share comment जरूर करें, अच्छा नहीं लगा तो आपकी मौज 

आपके क्षेत्र में इसे किस नाम से पुकारा जाता है। कभी आपने इसका इस्तेमाल किया है तो जरूर लिखें। 

सदैव आपका अपना शुभचिंतक
डाँ०अमनदीप सिंह चीमा, 
संस्थापक अमन आयुर्वेद,
WhatsApp & Call 099151 36138 

#VaidAmanCheema #AmanAyurved

Friday, March 29, 2024

Swarn Bhasma स्वर्ण भस्म

“स्वर्ण भस्म” Part-1
परिचय,विधि,लाभ सहित

•परिचय:-
स्वर्ण भस्म तैयार करने के लिए स्वर्ण का विशिष्ट गुरुत्व 19.4 तथा द्रवणांक 1064° शतांश तापमान है। 100 टंच का सोना स्वर्ण भस्म निर्माण के लिए अति उत्तम है। 

•शोधन:-
स्वर्ण को भस्म या वर्क बनाने से पहले उसका शोधन बहुत जरूरी है। ताकि उसकी अशुद्धियां दूर करके मनुष्य को स्वास्थ्य लाभ दिया जा सके। 
सुनार के पास जाकर स्वर्ण के पत्र बनवाकर , फिर इसे आग में तपाया जाता है‌। तपा हुआ स्वर्ण पत्र तैल , तक्र,कांजी,कुल्थी आदि के क्वाथ में 3-3 बार बुझाने से स्वर्ण शुद्ध हो जाता है। 
अब इसे भस्म बनाने या वर्क बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 
शुद्धि करण की विधियां और भी बहुत सारी है लेकिन यह विधि बहुत सरल और मेरी पसंदीदा है। 

•स्वर्ण भस्म बनाने की विधि:- 1
स्वर्ण भस्म एक बार में यानि एक बर्तन में एक तोला से 5 तोला तक ही बनाएं, ऐसा करने से भस्म उत्तम बनती है। 

10ग्राम स्वर्ण पत्र को बारीक कैंची की मदद से कतर लें या रेती की मदद से रगड़ कर बारीक कर लें। 
फिर इसे तुलसी के पत्तों के रस में खूब खरल करें। 
सूखने के बाद बराबर मात्रा में सुमलफार बराबर मात्रा में मिलाकर तुलसी के रस में एक हफ्ता 8 घंटे तक रोज खरल करें। 
फिर छोटी-छोटी टिकिया बनाकर सुखाकर, दीवाली वाले मिट्टी के 2 दीयों या सकोरे के बीच रखकर , सन्धि स्थान पर कपड़मिट्टी करके 1किलो कण्डों की आग दें।  आग खुले स्थान पर ही दें, धुएं से खुद को और दूसरों को बचाएं। 
फिट सम्पुट से टिकिया निकाल कर पुनः आधा भाग सुमलफार मिला कर प्रथम पुट की तरह पुट दें। 
तीसरी बार चोथाई भाग सुमलफार मिला कर पुट दें। लगभग 11 पुट देने से आप सकोरे से भस्म निकाल कर तुलसी पत्र रस में 7 दिन खरल करें। 
फिर गुलाब फूल के रस में 7 दिन खरल करके स्वर्ण भस्म को संभाल कर रख लें। 

स्वर्ण भस्म तैयार है। 

•विधि नंबर :-2 
शुद्ध करके बारीक किए गए 10ग्राम स्वर्ण पत्रों में 20ग्राम शुद्ध पारद मिलाकर दोनों को खरल में घोलकर पिट्ठी बना लें। इस पिट्ठी को तुलसी पत्र रस में 3 दिन खरल करने के बाद टिकिया बनाकर, धूप में सुखा लें, सराब समपुट में रखकर आधा किलो कंडो की आंच में फूंक दें। इस तरह 10बार करने से काले रंग की स्वर्ण भस्म तैयार मिलेगी, अगर एक दो पुट खुले में दी जाएगी तो लाल रंग की स्वर्ण भस्म तैयार हो जाएगी। 

•विधि नंबर :-3
शुद्ध करके बारीक किए हुए 10ग्राम स्वर्ण पत्रों में 10ग्राम शुद्ध पारद , 5ग्राम दुग्ध पाषाण मिलाकर जम्बीरी नींबू के रस में ( गलगल ) तीन दिन तक मर्दन करके जब पूरा मिश्रण सूख जाएं तो इसमें 10 ग्राम शुद्ध गंधक मिलाकर सम्पुट में बंद करके लघुपुट में फूंक दें। इस तरह तब तक पुट देते रहे जब तक चंद्रिका -रहित भस्म न हो जाए । निश्चन्द्र भस्म होने पर इसको कचनार की छाल के स्वरस की भावना देकर तीन पुट दें। इस तरह से बनी हुई भस्म जामुनी रंग की होती है। 

स्वर्ण भस्म निर्माण की अनेक विधियां हैं। यह उपरोक्त विधियां रस तंत्रसार,सिद्ध योग संग्रह ग्रंथ से ली गई है।  हम अपनी विशेष स्वर्ण निर्माण विधियां भी आपसे शेयर करेंगे। 

यह स्वर्ण भस्म निर्माण अनजान व्यक्ति न करें, गुरु की छत्रछाया में ही भस्म निर्माण का कार्य करें। 

सोना,चांदी,शीशा धातुओं की भस्म बनाते समय आंच अधिक होने पर तीनों धातुएं गलकर एक गाढ़ा पिण्ड बन जाती है। इसलिए बिना अनुभव के भस्म निर्माण न करें। योग्य गुरु से जरूर सीख लेना चाहिए। 

अपने हाथों से तैयार की गई यह स्वर्ण भस्म, कंपनी की स्वर्ण भस्म से 100गुणा अच्छी है। ज्यादा लाभकारी होती है। 

कंपनी की स्वर्ण भस्म 15000₹ से 22000₹ तक 1 ग्राम बिकती है। 1ग्राम (1000mg )

मात्रा:- चोथाई रत्ती से आधी रत्ती तक दूध,घी,मधु, मक्खन, मलाई आदि के साथ अथवा रोग अनुसार अनुपान के साथ ।

आठ रत्ती ( 1000mg मतलब 1ग्राम) 
एक रत्ती ( 125mg )
आधी रत्ती ( 65mg ) 
चोथाई रत्ती ( 32.5 mg ) 

एक महीने में आप रोग अनुसार साधारण मनुष्य के लिए आधा ग्राम से 2-3 ग्राम तक स्वर्ण भस्म का सेवन कर सकते हैं। ग्रंथ अनुसार।‌

विशेष नोट:- 
जो खिलाड़ी हैं , Zym lovers, रोज संभोग चाहते हैं या शौकीन हैं , उनके लिए हम विशेष मात्रा में रोग अनुसार विशेष दवाओं के साथ स्वर्ण भस्म मिलाकर दवा तैयार करके देते हैं। क्योंकि ऐसे व्यक्तियों को ज्यादा पावर चाहिए होती है , इन्हें साधारण मनुष्य से खुराक की भी ज्यादा जरुरत होती है। इसलिए स्वर्ण भस्म मिश्रित दवाएं ऐसे मनुष्यों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होती है। स्वर्ण भस्म की मात्रा हम सैट करते हैं , उम्र, वजन,body की जरूरत अनुसार। स्वर्ण भस्म की मात्रा हर किसी के लिए अलग-अलग हो सकती है। 

गुण और उपयोग:-
स्वर्ण भस्म स्निग्ध, मधुर, किंचित तिक्त,शीत वीर्य और रसायन गुण वाली है। 
मधुर,वृंहण,हृद्य,स्वर-शुद्धिकारक, प्रज्ञा, वीर्य, स्मृति,कांति,ओज बढ़ाने वाली है। 

एड्स में भी स्वर्ण भस्म का उपयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। 

स्वर्ण भस्म को मस्तिष्क विकार , वात रोग , हृदय विकार, मसल डिस्ट्राफी, सोरेबर्ल पल्सी, कैंसर, दृष्टि क्षीणता, पागलपन, डिप्रेशन, रसोली, ब्लड कैंसर, रोग प्रतिरोधक क्षमता, मधुमेह,दमा,राजयक्ष्मा,खिलाड़ी,Zym lovers, हार्ट ब्लाकेज, पक्षाघात, सैक्स कमजोरी, बांझपन, नामर्दी, शुक्राणु, शीघ्रपतन, लाइलाज रोग , पुराने जटिल रोगों में  रोगानुसार अनुपान के साथ हम इस्तेमाल करते हैं।‌

बहुत कम मात्रा में ही (चोथाई रत्ती से आधी रत्ती) स्वर्ण भस्म का सेवन करने से बहुत तेजी से अधिक लाभ मिलता है। 

कई वर्षों तक सैकड़ों दवा खाने के बाद भी जो रोग ठीक न हुआ हो , स्वर्ण घटित औषधियों से अच्छे होते हैं। 
अतिअंत कष्टदायक अवस्था में स्वर्ण भस्म घटित योग लाभकारी सिद्ध होते हैं। 
हार्ट अटैक वाले रोगी को मकरध्वज के साथ स्वर्ण भस्म का 
सेवन करवा देने से रोगी एक दो खुराक में शरीर में आई चुस्ती फुर्ती देखकर हैरान रह जाता है। 
मरते हुए रोगी की जीभ पर स्वर्ण भस्म शहद में मिलाकर चटा दी जाए तो रोगी कुछ घंटे तो बातें कर ही जाता है। 

कई कई वर्षों से दुखी सोरेबरल पल्सी, मस्क्यूलर डिस्ट्राफी, कैंसर , मधुमेह, नामर्दी, डिप्रेशन आदि रोगी स्वर्ण भस्म मिश्रित नुस्खों से ठीक होते हैं। 

स्वर्ण निर्मित योगों का इस्तेमाल करने के लिए आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं। 

स्वर्ण भस्म के
मेरे अगले लेख का इंतजार करें। 

लेख पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद

अगर आपने हमें follow नहीं किया तो कर लें। 
लेख अच्छा लगा तो शेयर जरूर कर दें। 

आपका अपना शुभचिंतक
✍🏻 वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद, दसुआ 144205 पंजाब
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#VaidAmanCheema #AmanAyurved #Swaran_Bhasma_part_1

Wednesday, March 27, 2024

Anand Vardhak Pills

आनंद वर्धक गोलियां
Anand Vardhak Pills 

शुद्ध अफीम 2ग्राम, 
स्वर्ण भस्म 200mg,
मकरध्वज 1 ग्राम,
सिंगरफ शुद्ध 1ग्राम,
काली मिर्च 1ग्राम,
लौंग,जायफल , जावित्री, दालचीनी, अकरकरा,केसर 
½-½ ग्राम, 

भांग के पत्तों के रस , पान के पत्तों के रस में खरल करके 
गोलियां बना लें। 

असमर्थ पुरुष:- 
जरुरत के समय तंदरुस्त आदमी एक गोली संभोग से दो घंटे पहले मलाई मिले हुए गर्म दूध से लें। इसके सेवन करने से संभोग में आनंद आता है। लंबे समय तक वीर्य रुकता है। पत्नी पति से पूर्ण रूप से संतुष्ट होती है। 

असमर्थ औरत:-
अगर इस गोली का औरत को भी सेवन करवा दिया जाएं तो संभोग में पूरा साथ देती है। पति को संतुष्ट भी करती है। खुद भी चर्म सुख प्राप्त करती है। आनंद प्राप्त करती है। 

लाभ:-
इन गोलियों को 40 दिन सेवन करने से बल , वीर्य , पाचन शक्ति बढ़ती है। इन गोलियों के सेवन से पुरुष मदमस्त स्त्रियों के साथ इच्छानुसार संभोग रचाकर उन्हें संतुष्टि दें सकता है। 

विशेषता:-
शीघ्रपतन रोगी वीर्य स्तंभन बढ़ाने के लिए,बल वीर्य बढ़ाने के लिए आनंद वर्धक गोलियां का इस्तेमाल करके अपने समस्या से पीछा छुड़ा सकते हैं।

मंगवाने के लिए संपर्क करें
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा, 
Call & WhatsApp No. 
099151 36138 

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Tuesday, March 19, 2024

मदमस्त महायोग गोलियां

•मदमस्त महायोग•

 // बनाने की विधि //

50ग्राम मघ पीपल
आधा किलो देसी गाय के  दूध में डालकर मंद आँच पर उबालें। दूध थोड़ा सा रह जाने पर पीपल को निकाल कर धोकर छाया में सुखा दे। अच्छी तरह सूखने के बाद पीस कर महीन चूर्ण बना लें। 

उपरोक्त मघपीपल चूर्ण में
सिद्ध मकरध्वज 5 ग्राम
स्वर्ण भस्म 300mg
हीरक भस्म 150mg 
अभ्रक भस्म सहस्र पुटी 2.5 ग्राम,
मुक्ता पिष्टी 5 ग्राम
रजत भस्म 2.5 ग्राम

सबको खरल में डालकर पान के रस में तीन दिन खरल करके  मिलीग्राम गोलियां बना लें। यह एक माह का नुस्खा लिखा है। हम इसकी गोलियां और कैप्सूल बनाते है। 

यह योग अतिअंत बल , वीर्य वर्धक , कफ -पित्त-वात रोगियों के लिए अनुपान अनुसार लेने से बहुत लाभकारी है। 

इसके सेवन करने से शरीर में नया रक्त पैदा होता है । भूख बढ़ती है। शरीर में नयी जान आती है। संभोग शक्ति पैदा होती है।

 स्तंभन शक्ति आती है। यह दवा उन लोगों के लिए अमृत है जिन्हे कफ , बलगम , शर्दी खांसी की समस्याएं रहती है।

 जिन मरीजों के वात रोग है , जोड़ों में दर्द रहता है वह भी इसका इस्तेमाल कर सकते है। अपनी संभोग शक्ति बढ़ा सकते है। 

इसके सेवन से चेहरे का तेज बढ़ता है। पेट विकार खत्म हो जाते है। 

जो महिलाएं सफेद पानी की समस्याओं से परेशान है और संभोग में रुचि नही है , इसका सेवन करने से रुचि उत्पन्न होती है और अपने पार्टनर को रतिक्रिया में पूर्ण सहयोग करती है। 

जो बजुर्ग जोड़े है शरीर में दर्द , जोड़ों में दर्द , पक्षाघात , लकवा , या हार्ट के मरीज है , जिन्हे डिप्रेशन के कारण या अन्य किसी वजह से शरीरक कमजोरी , या संभोग शक्ति खत्म हो गई है वह भी इसका इस्तेमाल करके जीवन में नया जौश , ताकत, जवानी प्राप्त कर सकते है। 

मैं अपने इस योग के बारे में जितना लिंखू उतना कम है। आप इसका इस्तेमाल करें और लाभ लें। 

कफ और वात रोगी इसे शहद से ले सकते हैं। ऊपर से गुनगुना दूध पी सकते है। 

पित्त रोगी इसे मलाई, मख्खन, दूध से इस्तेमाल कर सकते हैं। 

इसका कोई नुक्सान नहीं है ।‌

ज्यादा जानकारी के लिए आप हमारे Whatsapp पर संपर्क करें। 

आपका अपना
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
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Monday, March 4, 2024

low sperm Nil sperm

शुक्र और शुक्राणु बढ़ाने के लिए अनमोल नुस्खा 

“शुक्र शक्ति महायोग”
पुरूष शुक्राणु बढ़ाने के लिए , औरतों का अंडा बनाने के लिए

हर किसी को मां-बाप बनने की चाहत होती है । लेकिन जब किसी बिमारी की वजह से चाहत को पूरा करने के लिए रोग बाधा डालता है। तो मनुष्य निराश हो जाता है ‌। इसके लिए बहुत से कारण जिम्मेदार हो सकते हैं । उनमें से एक रोग है शुक्राणु न बनने की समस्या या शुक्राणु का कम बनना आदि , औरतों में अंडे का सही विकास न हो पाना । उक्त दोनों रोगों के लिए यह “शुक्र शक्ति महायोग” बहुत अच्छा काम करता है। 2 महीने इसका सेवन करने से पुरुषों के तंदरुस्त शुक्राणु बनते है और औरतों के अंडा बनने लग जाता है। पति-पत्नि संतान सुख प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं।
 जिन लोगों को बहुत दवा खाने के बाद भी लाभ न हुआ हो , उन्हे हमारे इस “शुक्र शक्ति महायोग”  का एक बार जरूर सेवन करना चाहिए । 

“शुक्र शक्ति महायोग”
बंग भस्म 5ग्राम,
अभ्रक भस्म सहस्त्र 5ग्राम,
स्वर्ण भस्म 500 मिलीग्राम
हीरक भस्म 200 मिलीग्राम
रजत भस्म 3ग्राम 
मोती पिष्टी 5 ग्राम
प्रवाल पिष्टी 10 ग्राम,
शुद्ध कौच बीज काला 50ग्राम,
शुक्राणु वर्धक योग -100ग्राम ।

सबको मिलाकर सुबह-शाम दूध से सेवन करवाते है। 

नोट:- स्वर्ण मोती रजत हीरा अभ्रक युक्त होने से शुक शक्ति महायोग की कीमत 15000रु है। जगह जगह से दवा खाकर निराश रोगियों के लिए यह मेरा बहुत ही सफल नुस्खा है। 

आपका अपना शुभचिंतक
डाँ० अमनदीप सिंह चीमा नाड़ी वैद्य 
Call & Whatsapp 099151 36138 

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#शुक्रशक्तिमहायोग #shukarshaktimahayog #VaidAmanCheema #AmanAyurved

Wednesday, February 14, 2024

शिलाजीत रसायन स्वर्ण युक्त

★ शिलाजीत रसायन स्वर्ण युक्त★

आयुर्वेद शास्त्र में शिलाजित बहुत प्रसिद्ध एवं प्रशंसित है. आयुर्वेद की प्रसिद्ध पुस्तक चरक संहिता में तो यहाँ तक लिखा गया है कि "जगत में ऐसा कोई साध्य रोग नहीं है जिसे उचित समय पर व उचित योगों के साथ विधिपूर्वक किये गये शिलाजित के प्रयोग से ठीक न हो।
शिलाजित न केवल रोगों का उपचार करने में सक्षम है, बल्कि यह सम्यक प्रयोग किये जाने पर स्वस्थ मनुष्य में भी उत्तम बल प्रदान करता है.

यही कारण है कि आयुर्वेद के बल्य, पौष्टिक, ओजवर्धक, दौर्बल्यहर, धातुपौष्टिक आदि अधिकांश योगों में तो शिलाजित का प्रयोग किया ही है, वहीं विभिन्न रोगों, जैसे कि मधुमेह, बहुमूत्रता, प्रमेह, धातुक्षीणता, नपुंसकता, निर्बलता, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, वातरोग, पाण्डु, उदर रोग, अंगघात आदि अनेक रोगों में यथायोग्य अनुपान से प्रयोग किया जाता है।

यह शिलाजित नामक पाषाण स्राव आयुर्वेदानुसार कटु, तिक्त, उष्ण, कटुपाकी, रसायन, छेदी, योगवाही गुण वाला होता है तथा कफ-मेद-अश्मरी-शर्करा, मूत्रकृच्छ, क्षय, श्वास, वातरोग, अर्श, पाण्डु, अपस्मार, उन्माद, शोथ, कुष्ठ, कृमि व उदर आदि अनेकानेक रोगों का नाश करने वाला होता है.

शिलाजित अपने उत्पत्ति क्षेत्र की प्रस्तर चट्टानों के गुणानुसार चार प्रकार का कहा गया है.

1. स्वर्ण शिलाजित:- मधुर, कषाय, शीतल, वातपित्तहर होता है.

2. रजत शिलाजित:- तिक्त, शीतल, मधुरपाकी, पित्तकफहर होता है.

3. ताम्र शिलाजित:- कटु, उष्ण, कफहर है.

4. लौह शिलाजित:- कड़वा, सौम्य, कटुपाकी, शीत होता है.
इनमें से लौह शिलाजतु सर्वश्रेष्ठ होता है.

** शुद्ध शिलाजित की पहचान कैसे करें:-

जैसाकि पूर्व में बताया गया है कि शिलाजित चट्टानों से स्रवित होता है, अत: अन्य खनिज द्रव्यों की भाँति इसकी उपलब्धता भी परिमित है. स्पष्ट है कि बाजार में उपलब्ध शिलाजित नकली व मिलावटी हो सकता है. प्राय: शिलाजित पहाड़ी क्षेत्रों में प्राप्त होता है, जहाँ वर्ष के अधिकांश समय सर्दी रहती है-सूर्य अपनी प्रखरता पर नहीं होता. अत: यह सम्भव नहीं कि टनों असली सूर्यतापी शिलाजित विक्रयार्थ प्राप्त हो सके.
अब यह आवश्यक हो जाता है कि असली शिलाजित की पहचान कर प्रयोग किया जाये, अन्यथा मनोवांछित लाभ प्राप्त न होने पर शिलाजित व्यर्थ की वस्तु समझी जाने लगती है और आयुर्वेद पर विश्वास डगमगाने लगता है.

** असली शिलाजित की परीक्षा:-

1. शिलाजित के छोटे से टुकड़े को कोयले के अंगारों पर डालने से धुँआ न उठे व सीधी लौ की भाँति खड़ा हो जाए उसे असली माने.

2. शिलाजित के टुकड़े को पानी में डालने पर तार तार होकर नीचे बैठ जाए तो वह असली है.

3. शिलाजित सूख जाने पर उससे गौमूत्र की तरह गंध आती है.

4. असली शिलाजित काले रंग का, गोंद के समान, चिकना व हल्का होता है.

उपरोक्त विधियों से परीक्षण कर तथा जानकारों से संदेह निवारण के उपरान्त प्राप्त असली शिलाजित निस्संदेह ही लाभप्रद व उपयोगी सिद्ध होगा. नकली शिलाजित से लाभ नहीं होता.

*विविध उपयोग:-
पंचकर्म विधि से शरीर का शोधन करने के पश्चात शिलाजित का प्रयोग किया जाने पर श्रेष्ठतम लाभ मिलता है.
शिलाजीत के कुछ प्रमुख प्रयोग  

यहाँ कुछ रोगों के लिए शिलाजित के सामान्य प्रयोग बताये जा रहे हैं.--

1. प्रमेह:- शिलाजित 2 रत्ती की मात्रा में एक चम्मच त्रिफला के साथ सेवन करें.
कहा गया है कि असाध्य प्रमेह में भी यदि एक तुला (लगभग 4.66 kg) शिलाजित का सेवन किया जाए तो वह रोगी पूर्ण स्वस्थ हो सकता है. हांलाकि आज के संदर्भ में यह मात्रा बहुत अधिक है.

2. मधुमेह:- शिलाजित 20 ग्राम, हल्दी 20 ग्राम, मेथी, गुड़मार व विजयसार तीनों 40-40 ग्राम मिलाकर महीन पीसकर जामुन के रस लेना लाभप्रद है.

3. उच्च रक्तचाप:- शिलाजित व अनन्तमूल का समभाग चूर्ण 500 mg की मात्रा में मुलेठी के काढे से लें.

4. बहुमूत्रता:- शिलाजित, बंग भस्म, इलायची दाना, वंसलोचन सूक्ष्म पीस कर 500 mg की मात्रा में गोखरू के क्वाथ से लें.

5. स्वप्नदोष:- शिलाजित, बंगभस्म, लौहभस्म, बबूल गोंद एकमेव कर त्रिफला रस से प्रयोग करें.

6. कामला:- शिलाजित, गिलोयसत्व गौमूत्र से सेवन करें.

7. मूत्रप्रदाह:- इलायची व पीपली चूर्ण को शिलाजित के साथ, चन्दनासव से प्रयोग करें.

8. मस्तिष्क बल्य:- ताजा मक्खन से शिलाजित सेवन करना दिमाग के लिए उत्तम है.

9. धातुक्षीणता:- शिलाजित को केशर-मिश्री मिले दूध से प्रयोग करें.

10. पाण्डु:- शिलाजित को लौहभस्म व त्रिफला से सेवन करना चाहिए.

11. ज्वर:- शिलाजित को पर्पटक क्वाथ से प्रयुक्त किया जाना चाहिए.

12. स्थौल्य:- 2 रत्ती शिलाजित खाली पेट शहद व जल से प्रयोग करवायें.

13. शिरशूल:- शिलाजित 5ग्राम, मजीठ व गिलोयसत्व 20-20 ग्राम मिलाकर दो ग्राम की मात्रा में आँवला मुरब्बा से दें.

14. धातु दौर्बल्य:- शिलाजित 16 भाग, लौहभस्म 4 भाग, अभ्रक भस्म 2 भाग, बंगभस्म 1 भाग मिलाकर 250 mg गोली बनाकर सुबह शाम मिश्रीयुक्त दूध से लें।

उपरोक्त प्रयोग एक दर्शिका मात्र है. रोगी व रोग के पूर्ण निदान पश्चात उचित समायोजन करें.

** शिलाजित युक्त विशिष्ट योग:-
शिलाजित के अनेक योग बाजार में उपलब्ध हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख योग हैं-
शिलाजत्वादि वटी
वीर्यशोधन वटी
चन्द्रप्रभा वटी
प्रमेहगजकेशरी वटी
आरोग्यवर्द्धिनी वटी
ब्राह्मी वटी
आदि....

** शिलाजित सेवन में अपथ्य:-
उष्ण पदार्थ, गरिष्ठ भोजन, लाल मिर्च, तेज मसाले, शराब, अण्डे, माँस-मछली, तैल, गुड, खटाई, कुलथी, मकोय, दिन में सोना, मल-मूत्र का वेग रोकना, अति व्यायाम, अति स्त्री संग, मानसिक तनाव आदि का शिलाजित सेवन काल में परहेज करें.

** शिलाजित सेवन वर्जित :-
अत्यन्त गुणयुक्त व उपयोगी होते हुए भी कुछ स्थितियों में इसका सेवन निषेध किया गया है. जैसे- पित्त प्रकृति, अम्लपित्त, अल्सर, दाह, शारीरिक उष्णता आदि.
अन्त में हम यही कहना चाहेंगें कि यथाविधि, उचित अनुपान से चिकित्सक की सलाह के अनुसार प्रयोग किया गया असली शिलाजित निस्सन्देह उपयोगी सिद्ध होता है. शीतकाल में शुद्ध शिलाजित या शिलाजित के योग अवश्य लाभ करते हैं.

शिलाजीत सूर्यतापी से हम  #शिलाजीत_रसायन_स्वर्ण_युक्त तैयार करते हैं जो कि शिलाजीत के गुणों में वृद्धि कर देता है। 
शिलाजीत रसायन के घटक निम्नलिखित हैं। 

शिलाजीत सूर्यतापी, 
अभ्रक भस्म सहस्त्र,
 केसर ,
 हीरक भस्म , 
स्वर्ण भस्म 

बहुमूल्य घटक होने से महंगा तो बनता ही है , इसकी पहली खुराक ही शरीर में करंट भर देती है। 
 
शिलाजीत रसायन आप कोरियर द्वारा मेरे से मंगवा सकते है। 9999/-₹ 

Order Now- limited Stock 

सदैव आपका अपना
वैद्य डाँ अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद, 
Call &  WhatsApp 099151 36138 

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Saturday, February 10, 2024

महा बल शाली महायोग

★महा बल शाली महायोग ★ 
( 30 पुड़िया वाला कोर्स )

यह दवा मर्दाना कमजोरी, पट्ठों की कमजोरी, weak immunity Power , body Builder, Zym lovers के लिए बेहतर कार्य करती है।‌

★महा बल शाली महायोग ★ 
( 30 पुड़िया वाला कोर्स )

अभ्रक भस्म 1000पुट्टी 5ग्राम , 
मल्ल सिंदूर 2.5 ग्राम , 
मोती पिष्टी 5 ग्राम , 
रौप्य भस्म 5 ग्राम
सिद्ध मकरध्वज 5ग्राम ,
स्वर्ण भस्म आधा ग्राम ( 500mg ) ,
हीरक ( वज्र ) भस्म आधा ग्राम ( 500mg ) 
महा बल वर्धक योग -10ग्राम 
गिलोय का सत् 10ग्राम 

यह योग किसी अच्छे चिकित्सक द्वारा ही तैयार किया जा सकता है,इसमें कूपीपक्व रसायन है , जो कि बहुत सावधानी से तैयार किए जाते है‌। फिर इस्तेमाल किए जाते हैं।

 अतः साधारण जन इसको बनाने की कोशिश न करें। 

सबसे पहले मल्ल सिंदूर और सिद्ध मकरध्वज को इतना खरल करें कि यह चमक रहित हो जाएं, फिर बाकी की दवाएं मिलाकर 30 पुड़िया बना लें।

 सुबह शाम एक एक पुड़िया शहद ,  मलाई या शहद + अदरक रस के साथ लें।
उपर से दूध पी लें।‌

तीन दिन में इतनी ताकत पैदा होगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसमें दूध घी जरुर इस्तेमाल करें। शादीशुदा जोड़े अगर दोनों इसका इस्तेमाल करें तो एक भी रात संभोग किए बगैर नहीं गुज़रेगी। संभोग में दोनों का आनंद बहुत गहरा होगा। दमे का मरीज इस दवा को खाएगा तो जो थोड़ा सा चलने से ही असमर्थ था , ओलंपिक में जाने के सपने देखेगा। जिनकी immunity Power बहुत कमजोर है। उनके लिए बहुत कारगर है। Zym में जो ज्यादा समय बिताना चाहते हैं या body builder बनना चाहते हैं , वह इस नुस्खे का जरुर इस्तेमाल करें। 

इसमें स्वर्ण भस्म और हीरा भस्म अतिअंत महंगे हैं, जो समर्था रखते हैं वो इसका जरूर इस्तेमाल करें।‌

Price 15000₹ #महा_बल_शाली_महायोग

आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमा,
अमन आयुर्वेद, 144205, पंजाब
Call & WhatsApp 099151-36138

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Monday, August 29, 2022

Mall Sindur मल्ल सिंदूर ਮੱਲ ਸੰਧੂਰ

मल्लसिन्दूर क्या है ? बनाने की विधि, लाभ, विस्तार सहित पोस्ट
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 शुद्ध संखिया 4 .5 तोला ,
शुद्ध पारद 9 तोला ,
शुद्ध गन्धक 5.5 तोला , 
रस कपूर 9 तोला  
स्वर्ण 
प्रथम पारा और गन्धक की कज्जली करें , पीछे उसमें रस कपूर और संखिया पृथक् पृथक् पीस कर मिला ग्वारपाठा ( घीकुमारी ) के रस में दो दिन मर्दन कर सात कपड़मिट्टी की हुई आतशी - शीशी में भर कर बालुकायन्त्र में 2 दिन पकावें । स्वांग - शीतल होने पर शीशी को तोड़कर शीशी के गले में जमे हुए मल्लसिन्दूर को निकाल तीन दिन पत्थर के खरल में पीस , खूब महीन होने पर शीशी में भर लें ।
 - सि . भै . म . माला 

★नोट - मल्लसिन्दूर बनाने में बहुत सावधानी की आवश्यकता है । प्रारम्भ में कूपीस्थ द्रव्यों के पिघलने तक मन्द अग्नि दें , बाद में तेज अग्नि दें । लोहे की सलाई से बराबर शीशी के गले को साफ करते रहें । जब तक शीशी में गन्धक रहेगा ; तब तक सलाई में गन्धक पिघला हुआ काले रंग का देखने में आयेगा । करीब 10-12 घन्टे में इस गन्धक का जारण हो जाता है । फिर संखिया का धुआँ निकलने लगता है । इसी समय डाट लगा दें अन्यथा संखिया सब निकल जायेगा । गन्धक रहते हुए यदि डाट लगा दी जाती है तो गन्धक की गैस बन कर डाट को फेंक देती है या शीशी को तोड़ डालती है । अतः डाट सावधानी से लगावें । साथ ही संखिया के धुआँ से भी बचना चाहिए । मल्लसिन्दूर के लिये 36 घण्टे की आँच पर्याप्त है । यदि मल्लसिन्दूर के योग में पारद से चतुर्थांश #स्वर्ण #वर्क मिलाकर बनाया जाय , तो इससे अधिक गुणकारी मल्लचन्द्रोदय बन जाता है । हम स्वर्ण डालकर बनाते है। 

★मात्रा और अनुपान - आधी रत्ती से 1 रत्ती , दिन में दो बार शहद और अदरक के रस के साथ या रोगानुसार अनुपान से दें । 

★गुण और उपयोग -संखिया और कज्जली का यह रासायनिक कल्प अत्यन्त तीक्ष्ण और उष्णवीर्य है । 
पित्त प्रधान रोगों में और पित्त प्रकृति के पुरुषों को यह बहुत हल्की मात्रा में सौम्य औषध सितोपलादि चूर्ण, प्रवाल पिष्टी आदि के मिश्रण के साथ देना चाहिए और ठण्डा उपचार करना चाहिए । 
वात और कफ के विकारों में यह तीर की तरह शरीर में प्रवेश कर शीघ्र ही उत्तम फल दिखलाना है । जन्तुग्न गुण के कारण रक्त में घुसे हुए मलेरिया , हैजा , गरमी ( सिफलिस ) आदि के कीटाणुओं को जल्दी नष्ट करता है । यह रक्तवाहिकाओं में उत्तेजना पैदा करना है और हृदय की गति को बढ़ाता है । तेज बुखार में इसे नहीं देना चाहिए । आतशक के लिये तो इसे न्यूसल्वर्सन इन्जेक्शन ही समझें । आतशक या सूजाक के कारण होने वाले गठिया तथा अन्य उपद्रवों में भी बहुत शीघ्र लाभ देखा गया है । पक्षाघात , आमवात धनुष्टंकार आदि वात रोगों में और कफ - सम्बन्धी कास , श्वास , न्यूमोनिया , उरस्तोय , डब्बा आदि रोगों में आशातीत लाभ करता है । शीतांग और कफ प्रधान सन्निपात में यह अपूर्व प्रभाव दिखलाता है । स्त्रियों के हिस्टीरिया रोग में इसका बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है । एक सप्ताह में ही सब दौरे समाप्त हो जाते हैं । बुढ़ापे की दुर्बलता और पुराने दमे के रोग में मल्लसिन्दूर अमृत के समान गुण करता है । यह पाचक रस को पैदा करके भूख पैदा करता है और मूत्राशय तथा शुक्रप्रणालियों की कमजोरी को दूर करके रक्त उत्पन्न करता है । हस्तमैथुन से नामर्द हुए मनुष्य को इसे अवश्य सेवन करना चाहिए । हैजे और अजीर्ण जन्य दस्तों के विष को यह जल्दी नष्ट करता है । वात , कफजन्य प्रमेह में यह रसायन अच्छा गुण दिखलाता है । अतः केवल बल - वीर्य वृद्धि के लिये भी इसका सेवन किया जाता है । यह थोड़े ही दिनों में शरीर को पुष्ट बनाकर मैथुन शक्ति को बढ़ा देता है । इसको प्रवालपिष्टी जैसी सौम्य औषध के साथ मिलाकर खिलाने से ज्यादा गर्मी नहीं मालूम होती है । कफजन्य सन्निपात में मल्लसिन्दूर का प्रयोग किया जाता है । सन्निपात की प्रारम्भिक अवस्था में इसका प्रयोग करने से सन्निपात की शक्ति कम हो जाती है तथा रोगी भी विशेष परेशान नहीं होता । कफ प्रकोप के कारण कंठ में कफ भरा हुआ रहता हो , घर्र घर्र आवाज होती है , साथ ही थोड़ा कफ भी निकलता हो , अधखुले नेत्र , अक - बक बकना , तन्द्रा , बेहोशी , कभी - कभी निद्रा आ जाना , ज्वर की गर्मी भी ज्यादा न मालूम पड़े - ऐसी अवस्था में मल्लसिन्दूर मधु के साथ देने बहुत फायदा करता है । दूषित जलवायु या कफकारक पदार्थ का विशेष सेवन करने से कफ प्रकुपित हो छाती में संचित होने लगता है । कफसंचित होने से फुफ्फुस और वातवाहिनी नाड़ी कमजोर हो जाती है , जिससे कफ जल्दी बाहर नहीं निकल पाता । फुफ्फुस की कमजोरी के कारण खाँसने में भी कष्ट होता है । ऐसी हालत में मल्लसिन्दूर के प्रयोग से संचित कफ बाहर निकलने लगता है । मल्लसिन्दूर के साथ प्रवाल चन्द्रपुटी या अभ्रक तथा लौह भस्म आदि भी मिलाकर देने से बहुत फायदा होता है । न्यूमोनिया या इन्फ्लुएंजा आदि रोगों में जिनका असर खास कर फुफ्फस पर पड़ता है , ऐसे रोगों से मनुष्य जब ग्रस्त हो जाता है , तब फुफ्फुसों की कमजोरी के कारण श्वास लेने में भी कष्ट होता है और रोगी इतना कमजोर हो जाता है कि वह देर तक बातें भी नहीं कर सकता तथा उसका हृदय भी कमजोर हो जाता है । ऐसी दशा में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती , मोती भस्म या पिष्टी 1 रत्ती , लौह भस्म 1 रत्ती- इन्हें मधु या पान के रस में मिलाकर देने से लाभ होता है । मलेरिया ( विषम ज्वर ) में मधु और तुलसी पत्ती के रस के साथ दें । आतशक और सूजाकजन्य वात विकारों में मंजिष्ठादि क्वाथ या सारिवादि हिम और मधु के साथ दें । पक्षाघात आदि विकारों में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती मधु के साथ दें । ऊपर से महारास्नादि क्वाथ 5 तोला मधु मिलाकर पिला दें । प्रमेह और बहुमूत्र में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती , बंग भस्म 1 रत्ती मधु के साथ दें । शुक्रक्षय में मल्लसिन्दूर आधी में रत्ती , छोटी इलायची चूर्ण 4 रत्ती 2 माशे मिश्री में मिला दूध के साथ दें । आतशक और उसके विकारों में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती मधु में मिलाकर चटा दें । ऊपर से सारिवाद्यासव 2 तोला बराबर पानी मिलाकर देना चाहिए । न्यूमोनिया , इन्फ्लुएंजा आदि रोगों में श्रृंगभस्म या गोदन्ती भस्म में मिलाकर पान के रस और मधु के साथ दें ।
आ.सा.सं.ग्ं

यह पोस्ट आपकी जानकारी के लिए है। अनजान इसे न बनाएं। किसी सिद्ध हस्त अनुभवी वैद्य से प्राप्त करके उनके मार्गदर्शन में ही सेवन करें। 

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आपका अपना शुभचिंतक
डाँ० अमनदीप सिंह चीमाँ वैद्य
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