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Wednesday, April 30, 2025

Diabetes मधुमेह केसरी महायोग रसायन

“स्वर्ण भस्म -भाग -10 

“मधुमेह केसरी महायोग” 
“रसायन”

मधुमेह और मधुमेह के कारण कमजोरी, मर्दाना कमजोरी के लिए स्पैशल योग 

घटक:- 
स्वर्ण भस्म, मोती पिष्टी, चांदी भस्म, मकरध्वज
5-5 ग्राम ,
स्वर्ण बंग, लौह भस्म, अभ्रक भस्म ,त्रिबंग भस्म 
10-10ग्राम, 
स्वर्ण माक्षिक भस्म, शुद्ध शिलाजीत, शुद्ध कारसकर,त्रिकुटा
15-15 ग्राम,
गुड़मार बूटी extract,
विजयसार extract,
मामेजवा extract, 
निबोली
20-20ग्राम 

सब को खरल में डालकर 
गोखरु, दालचीनी, छोटी इलायची क्वाथ,घृतकुमारी के रस में 3-3 दिन ( कुल 12 दिन, रोज आठ घंटे , कुल 96 घंटे ) घोंटकर गोलियां बना, सुखा कर रख लेते हैं।  

गुण और उपयोग- यह रसायन प्रमेह, मधुमेह, मूत्रकृच्छ, अश्मरी और दाह आदि को नष्ट करता है।

 शुक्रस्राव को केवल 3 दिन में ही रोक देता है। इसके सेवन से मधुमेह में शर्करा की मात्रा कम होती है। इसके द्वारा अग्न्याशय की विकृतिजन्य पाचन-- क्रिया की न्यूनता से शारीरिक धातु-उपधातुओं की विकृति दूर हो जाती है और अग्न्याशय सबल होने पर शर्करा की अधिक उत्पत्ति नहीं होती है।

मधुमेह में होने वाले अधिक पेशाब, प्यास, मुँह सूखना, भूख अधिक न लगना, आँखों के सामने अंधेरा छा जाना, भ्रम होना, कानों में आवाज होना, बेचैनी, सिर-दर्द आदि लक्षण होने पर यह बहुत फायदा करता है। 

मधुमेह में वात प्रकोप के कारण सर्वांग में दर्द, रक्तवाहिनी नाड़ियों में वात-प्रकोप होना, कलाय खंज (लंगड़ापन), चलने में पाँव काँपना, शरीर में सन्धियों की शिथिलता तथा उनमें अधिक दर्द होना, इन लक्षणों में इस दवा के उपयोग से बहुत फायदा होता है।

पुराने मुककृच्छ रोग में इसका उपयोग किया जाता है। इसमें मूत्र का वेग तो मालूम पड़ता है, किन्तु मूत्राशय से लेकर मूत्रनली के बीच किसी चीज की रुकावट हो जाने से पेशाब खुलकर न होकर कठिनता से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में होता है। कठिनता से पेशाब होने के कारण ही इस रोग का नाम "मूतकृच्छ्र" पड़ा है। 

 प्रमेह अथवा मधुमेह में  विशेष गुणकारी है, इसके सेवन से इन्शुलीन जैसा प्रभाव होता है।

यह दवा 5 मरीजों का कोर्स है। यह नुस्खा में 10महीने की मात्रा के हिसाब से बताया गया है। हम जरुरत अनुसार ज्यादा भी तैयार करते हैं। 
दो महीने का एक मरीज के लिए । 
1 महीने का 15995/- खर्च , 2 महीने का 30595/-
रुपए खर्च है। इस नुस्खे में स्वर्ण भस्म 1 लाख की 5 ग्राम है। मोती , मकरध्वज, चांदी भस्म, अभ्रक भस्म सहस्त्र भी महंगे योग हैं। इसे बनाने की labour अलग है। पाठक इस बात का विशेष ध्यान रखें।‌

जरुरतमंद हमसे देश विदेश में मंगवाकर लाभ ले सकते हैं। 

मिलता हुं अगले लेख में ... तब तक आप सभी को 🙏🏻

अगर पोस्ट अच्छी लगे तो शेयर जरूर करें, कोई पैसा नहीं लगता शेयर करने के लिए 

“सदैव आपका अपना शुभचिंतक” 
•वैद्य अमनदीप सिंह चीमा, 
अमन आयुर्वेद, 144205, पंजाब 
Call & WhatsApp 
09915136138 

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Sunday, May 7, 2023

तथाकथित वैद्य लोगों के लिए

🚨जरुरी सूचना , यह लेख नही पढ़ा तो आपको एक दिन जरुर पछताना पढ़ेगा । 🙏🏻🔍

यह विषय चर्चा से कुछ हटकर है लेकिन अतिजरुरी है , इसलिए आपसे शेयर रहा हुं। 

कुछेक वैद्य है , अन्य ग्रुप में जो कह रहे कि वो एक साल में ही वैद्य बन गए, उनके पास हजारों नही हजाड़ो नुस्खे है,उनके पास बहुत से ग्रंथ है। 
और उसी ग्रुप में उनके गुरु जो कि यह घोषणा करते है कि धीरे धीरे सब सीख जाते है। उसका तथाकथित गुरु कह रहा हे , कि उसे भी छे माह में आयुर्वेद का ज्ञान हो गया , और रोगियों की चिकित्सा करता है। अब वो चिकित्सा कहा करता है , कैसे करता ,भगवान जाने और वो अपने नाम के आगे वैघ लिखते है 😄 , वैद्य नही वैघ । उन्हे यह नही मालुम कि वैद्य होता है।  एक और बात उन्होने परसनल और ग्रुपों में भी बताया कि वो अपने चेले को अच्छी तरह जानते है , वो कभी गलत नुस्खा किसी ग्रुप में भेज ही नही सकता ।‌ क्योकि उसे एक साल हो गया , आयुर्वेद पर काम करते हुए।  और उन चेले के तथाकथित गुरु कहने लगे कि वो भी अन्य , अनेक वैद्यों से दवा पूछा करते थे , रोगियों के लिए , खुद रोगी बनकर 🤦‍♂️, ताकि किसी का भला हो जाए। अरे यह कैसा भला हुआ , भला करने के और भी बहुत रास्ते है। अगर रोगियों की चिकित्सा करवाना ही है तो स्थानीय किसी कुशल वैद्य से उनका इलाज करवा सकते है।‌ या किसी पारारंपिक वैद्य से सीख सकते है। सेवा ही  करनी है।‌आयुर्वेद में जल्दबाजी नही , समय लगता है सीखने में।‌एक बात और इतनी जल्दबाजी में सीखें लोग मल्ल , सिंगरफ आदि रसायन योगों के बिना रोगी को इलाज ही नही बताते । जबकि ऐसे योग 100 में सें 10% रोगियों के लिए , बहुत पुराने केस में जहां दवा काम न रही हो लगाने चाहिए , लगाने ही है तो बहुत कम मात्रख में , जितना  ग्रंथ में बताया उसके अनुसार या रोगी , रोग , देश , काल , आदि का विचार करके । पर पता नही क्यों लोगों का नुक्सान करने पर तुले है यह लोग । अगर इन्हे अच्छी मत दी जाए तो अहं को चोट लगती है इनके और अपने आप को सच साबित करने के लिए ग्रुपों से सभी सबूत आडियों या लिखित टिप्पनी डिलीट करके ग्रुप से निष्कासित कर देते है। फिर सच्चा होने के लिए लंबे लंबे लेख , लंबे लंबे आडियों देते है।‌यह लोग आयुर्वेद को बहुत नीचा गिरा रहे है।
और भी बहुत किस्से है। समय समय अनुसार शेयर करुगा। 

और भी बहुत बातें है उनके बारे में  जोकि मर्यादा वश मैं यहां शेयर नही करना चाहता , अब बताओ ऐसे लोगों के हाथ आयुर्वेद की वांगडोर होगी तो क्या होगा । 

प्रकृति तो हिसाब लेगी ही ऐसे लोगों से , जो कि लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे है। उन्हे रोका भी टोका भी , लेकिन उन्हों का कहना था , उनका इसमें उनका कोई स्वार्थ नही है। हम सेवा कर रहे है। अरे भाई यह कैसी सेवा , गलत नुस्खे देकर लोगों को मारोगे क्या , किसी ने‌ बिना सलाह , जाने अनजाने में वो नु्स्खा बना लिया तो । कुछेक नये वैद्य ही अगर उनका गलत नुस्खा बना लें जो बेचारा नया नया BAMS करके आया हो , वो तो मारेगा मरीज को , क्योकि वो बेचारा अनजान तो जानता ही नही कुछ आयुर्वेद के बारे।‌ अब ऐसे तथाकथित वैघ🔍 ( वैद्य )  अगर छाती पीट पीट कर कहें कि वो आयुर्वेद जानकार है तो कोई नया चेला ऐसे तथाकथित गुरु से गलत ज्ञान लेकर लोगो का भट्ठा गोल कर देगा । 

बदनाम कौन होगा ,आयुर्वेद और ऐसे वैद्य जो वर्षों से , पीड़ी दर पीड़ी आयुर्वेद में मेहनत कर रहे है। 
ऐसे घड़ेचू लोगों ( घड़ेचू शब्द को मेरे बड़े भाई वैद्य रणजीत सिंह खालसा ऐसे तथाकथित वैघ ( वैद्य ) को कहते है , जो आयुर्वेद का सत्यानाश करने पर तुले हुए है ) के कारण ही लोगों का आयुर्वेद से विश्वास उठ जाता है। और आयुर्वेद विरोधियों को मौका मिल जाता आयुर्वेद को नीचा दिखाने का । 

अब आप अपनी राय अवशय दें।‌
मैंने अगर किसी की शान के खिलाफ बोला हो , अगर इस लेख को पढ़कर किसी का दिल दुखे तो मैं दोनों हाथ जोड़कर क्षमाप्रार्थी हुं। 🙏🏻

नोट:- यह मेरे निजी विचार है , जरुरी नही कि हर कोई मेरे विचारों से सहमत हो । सहमत या असहमत होना यह आपके विचारों पर छोड़ता हुं। एक बार दस मिन्ट आंखें बंद करके शांत मन से मेरी बातों पर जरुर विचार कीजिएगा। मेरे मन की पीड़ा को मैंने आपके सामने रखा है । 🪷

धन्यवाद सहित 🙏🏻
🫂आप सभी का अपना शुभचिंतक💐
✍️लेखक वैद्य अमनदीप सिंह चीमा 
Mobile & Whatsapp 
9915136138