Saturday, October 22, 2022

Jai Ayurveda Jai Dhanwantari

मेरे प्यारे मित्रों नमस्कार

सभी को धन्वंतरि त्रयोदशी की हार्दिक शुभकामनाएं 

श्री गणेशाय नम: श्री महालक्ष्मै नम: श्री धन्वन्तयै नम:

आप सब मित्रों को ( धन्वन्तरि त्रयोदशी )धनतेरस की बहुत- बहुत शुभकामनाएं । 

★धन्वन्तरि त्रयोदशी दीवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है ।जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि इसे कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है । इस दिन को भगवान धन्वन्तरि ,जो कि आयुर्वेद के गुरू और पिता है,उनके जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है । इसदिन धन्वन्तरि का जन्म हुआ था । भगवान धन्वन्तरि देवताओ के चिकित्सक है और भगवान विष्णु जी के अवतारों में से एक माने जाते है । धन्वन्तरि त्रयोदशी के दिन को धन्वन्तरि दिवस के नाम से भी जाना जाता है । 

★भगवान धन्वन्तरि जी को हिन्दु धर्म में देवताओ का वैद्य कहा गया है ।ये एक महान चिकित्सक थे ।जिन्हे देव पद प्राप्त हुआ ।

★पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वन्तरि इसी दिन अमृत पात्र के साथ प्रकट हुए थे ।
शरद पुर्णिमा को चंद्रमा ,कार्तिक द्वादशी को कामधेन् गाय,त्रयोदशी को धन्वन्तरि ,चतुर्दशी को काली माता ,और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का पार्दुर्भाव हुआ था,इसलिए दीपावली के दो दिन पहले यह पर्व मनाया जाता है । इसी दिन इन्होने आयुर्वेद का पार्दुर्भाव किया था ।

★इसीलिए जो लोग आयुर्वेद दवाओ का अभ्यास करते है । उनके लिए यह दिन बहुत ही महत्वपूर्ण होता है ।इस दिन लोग भगवान धन्वन्तरि की पूजा करते है और उनसे अच्छे स्वास्थ की प्रार्थना करते है । 

★इन्हे भगवान विष्णु का रूप माना जाता है ।जिनकी चार भुजाएं है । ऊपर की दोनों भुजाओ में शंख और चक्र धारण किए हुए है । जबकि अन्य दोनों भुजाओ में से एक में जलूका और औष्धि ओर दूसरे में कलश है । इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है ।इसलिए धनतेरस को पीपल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है । 

★आयुर्वेदिक चिकित्सक इन्हे आरोग्य का देवता कहते है । इन्होने ही अमृतमय औष्धियों की खोज की थी ।इनके वंश में दिवोदास हुए,जिन्होने “शल्य चिकित्सा" का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्राधानाचार्य सुश्रुत बनाए गए ।उन्होने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी ।सुश्रुत विशव के पहले सर्जन थे ।

★इसी दिन धनत्रयोदशी या धनतेरस का पर्व भी मनाया जाता है । धनत्रयोदशी के संदर्भ मे यह दिन धन और समृद्धि से सम्बंधित है । लक्ष्मी-कुबेर पूजा के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है । इसदिन लोग धन - संपत्ति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए देवी लक्ष्मी के साथ- साथ भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है । भगवान कुबेर जिन्हे धन- संपत्ति का कोषाध्यक्ष माना जाता है और लक्ष्मी जिन्हे धन- संपत्ति की देवी माना जाता है ,की पूजा साथ में की जाती है । परंतु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए अच्छी सेहत चाहिए जो कि भगवान धनवंतरि उन्हे देते है । 

🙏श्री धन्वन्तरि जी की आरती🙏

 ॐ जय धन्वन्तरि देवा , प्रभु जय धन्वन्तरि देवा । 
जरा रोग से पीड़ित , जन जन सुख देवा ।। 
तुम समुद्र से निकले , अमृत कलश लिए , प्रभु अमृत कलश लिए । आदिवासुर के संकट आकर दूर किये । ॐ जय ...... 

आयुर्वेद बनाया , जग में फैलाया , प्रभु जग में फैलाया । 
सदा स्वस्थ रहने का साधन बतलाया , ॐ जय धन्वन्तरि 
भुजा चारि अति सुन्दर शंख सुधा धारी । प्रभु शंख ........ 
आयुर्वेद वनस्पति से शोभा भारी , ॐ जय धन्वन्तरि देवा ... 

 तुमको जो नित ध्यावे , रोग नहीं आवे , प्रभु रोग ........ 
असाध्य रोग भी उसका निश्चय मिट जावे । ॐ जय ......
 हाथ जोड़ कर प्रभु जी दास खड़ा तेरा । प्रभु जी दास .. 
वैद्य समाज तुम्हारे चरणों का चेरा । ॐ जय ..... 

धन्वन्तरि जी की आरती जो कोई गावे । प्रभु प्रेम सहित गावे । 
रोग शोक नहीं आवे , सुख समृद्धि पावे । ॐ जय धन्वन्तरि देवा , 
प्रभु जय धन्वंतरि देवा ,जरा रोग से पीड़ित जन जन को सुख देवा 

🙏 जै आयुर्वेद जै धनवंतरी 🙏

आपका अपना शुभचिंतक 
डाँ०अमनदीप सिंह चीमाँ नाड़ी वैद्य,पंजाब
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Monday, October 3, 2022

Power, Stamina ,Strength -Hair

🌿मेरे मुख्य अनुभूत महायोग🌿

 क्या आप ताकत , जौश , जवानी दुबारा हासिल करना चाहते है? 

1.मेरा पहला अनुभूत प्रयोग ✍️
💪 ताकत ,जौश ,जवानी का नुस्खा👌

जिनके बाल झड़ते हो , सफेद हो रहे हो , Dandruff हो उनके लिए यह मेरा बहुत ही खास़ नुस्खा है । मुझे इस नुस्खें ने बहुत ही यश दिलवाया है । यह नुस्खा मैं हमेशा ही तैयार रखता हुँ । आप जरूरत अनुसार बैंक पेमैंट करके कोरियर/पोस्ट से मंगवा सकते है ।देश-विदेश में लोग कोरियर सुविधा 📦 द्वारा मंगवाते है। साथ में हम विशेष तैल तैयार करते है। उसका भी लेख हमने फेसबुक , आपने ब्लॉग पर डाला है। 

💪👌केस रंजक - जौश वर्धक रसायन महायोग ✍️

१.भृंगराज का छाया में सुखाकर बनाया चूर्ण - 800ग्राम ,
२.आमलकी रसायन - 400ग्राम ,
३.काले तिल असली का चूर्ण - 400ग्राम ,
४.लौह भस्म - 20ग्राम 1000 पुट्टी,
५.अभ्रक भस्म 20ग्राम 1000 पुट्टी ,
६.गंधक रसायन स्पैशल- 60ग्राम ,
७.स्वर्ण भस्म -2 ग्राम स्पैशल 
भावना :- 7 बार भृंगराज के रस में , 7 बार ताजे हरे आंवले के रस में घुटाई करके सुखाना है। आपकी दवा तैयार है। 

🫵आपसे कुछ विशेष बात:- 
इसमें स्वर्ण भस्म स्पैशल , लौह भस्म स्पैशल 1000 पुट्टी, अभ्रक भस्म 1000 पुट्टी काफी महंगी है। स्वर्ण भस्म बाजार में कई कंपनियों की अलग-२ रेट में उपल्बध है। लेकिन हमने पाया है कि स्वर्ण भस्म के नाम पर लेवल ही लगा होता है। रिजल्ट मनपसंद , मनचाहा नही मिल पाता। फिर मरीज कहता है नुस्खा बनाया लाभ नही मिला। बस दवा की अशुद्धता , सही परख न कर पाना , गली-सढी , पुरानी, कीड़ा लगी, पंसारी की बेईमानी के कारण नुस्खा खराब हो जाता है। दोष , आयुर्वेद और वैद्य पर चला जाता है। दवा बनाने में बहुत मेहनत , समय , दवाओं को अच्छी तरह देख-परखकर इस्तेमाल में लाना, मेहनत का भी विशेष महत्व है। तभी जो लिखा है , वैसा लाभ मिल पाता है।  

✍️ कुछ नुस्खें की तारीफ:-
इसके प्रयोग से बुड्डे भी जवान हो जाते है । नयी जवानी ,जोश बढता है । बहुत ही लाभकारी योग है । स्वर्ण के बगैर भी बना सकते है। जिन्हे सिर्फ बालों की दिक्कत है। जो ताकत के लिए तैयार करना चाहे वो इसमें स्वर्ण भस्म डालकर ही बनाएं। तभी जौश , जवानी आएगी। हर उम्र में सेवन किया जा सकता है । ताकत के भूखे इसका प्रयोग करके फायदा ले सकते है । बाल झड़ने रूक जाते है , घने काले लंबे हो जाते है । 

 💊 नुस्खा इस्तेमाल कैसे करें?
सुबह-शाम दूध ,जूस , मक्खन, मलाई जो आपको अच्छा लगे उसी से ले सकते है । चिकित्सक की सलाह बिना कोई भी दवा , कभी भी न लें। 

मेरा दूसरा अनुभूत प्रयोग ✍️
2.मेरा दूसरा अनुभूत नुस्खा 👌✍️

अपने दवाखाने पर मैं यह तैयार कर , देश -विदेश कोरियर सुविधा 📦द्वारा भजता हुं। बी.पी में बहुत लाभकारी है । आप भी तैयार करके प्रयोग करें या किसी अनुभवी वैद्य जी से बनवा लें । उच्च रक्तचाप रोगी जो रोजाना गोली लेते है , डाक्टर सारी उम्र दवा खाने को बोल देते है । मैंने अपने इस योग द्वारा गोली सदा के लिए छुड़वाई है । इस योग को लकवा , अधरंग के रोगियों, दिमागी कमजोरी, नींद न आने की समस्या, मिर्गी आदि में भी हम प्रयोग करते है। 

१.भृंगराज छायाशुष्क चूर्ण 100 ग्राम,
२.ब्राह्मी छायाशुष्क चूर्ण 100 ग्राम,
३.अर्जुन छाल ताजा का बनाया चूर्ण 100 ग्राम,
४. घोड़बच 50 ग्राम,
५.शंखपुष्पी 100ग्राम,
६.आँवला 100 ग्राम,
७.रजत ( रोप्य , चांदी ) भस्म 10 ग्राम,
८.मोती ( मुक्ता ) पिष्टी 10 ग्राम,
९.सिद्ध मकरध्वज 10ग्राम

कोई भी चीज बाजार की न लें। भस्में आप अच्छी कंपनी की ले सकते है। 
जड़ी बूटी ताजी लेकर सुखाकर दवा तैयार करें। 

💊दवा बनाने की विधि:- 
सबसे पहले मकरध्वज चमकरहत होने तक खरल करके ( न घिसने वाले खरल में ) (खरल को अंग्रेजों की भाषा में मोरटर कहते है। ) रख लें । फिर भस्म और पिष्टी मिलाने के बाद बाकी जड़ी- बूटीयों के चूर्णों को कपड़छान कर , बताई गई मात्रा मिलाकर , नागरमोथा और अर्जुन के रस में सुखा कर रख लें । 

💊दवा लेने की विधि:- 
सुबह- शाम 3-3 ग्राम दवा, अर्जुनारिष्ट , सारस्वतारिष्ट 15-15 मि.ली. बराबर जल मिलाकर सेवन करें । 

यह दोनों योग मेरे पास हर समय तैयार रहता है। घर बैठे आप मंगवा सकते है । 

ऐसे नुस्खों की ज्यादा जानकारी के लिए आप मेरा ब्लॉग जरुर पढ़े, मेरा फेसबुक पेज KOHINOOR AYURVEDA जरुर follow कर लें। 
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सभी के link 🔗 दे रहा हुं। और हां पोस्ट Share जरुर किया करें, इससे हमारा हौसला बढ़ता है। हम और भी अच्छे-अच्छे नुस्खे आपके लिए लेकर आएंगे। आने वाले समय में आपको बहुत कुछ अच्छा सीखने और जानने को मिलेगा । इसलिए हमारे साथ जरुर बने रहे। 

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लेखक✍️ सदैव आपका अपना शुभचिंतक 
DrAmandeep Singh Cheema ,Punjab, India 
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आपको यह पोस्ट कैसी लगी , Comment करके जरूर बताएं। Link & Share Follow करना न भूलें।

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Wednesday, September 14, 2022

Psoriasis eczema skin Problems

~सोरायसिस,दाद,खुजली,चर्म रोगों की कामयाब औष्धि~

*समर्पित =पूरी कायनात को , आज मेरे जन्म दिन 14September मेरे जन्मदिन पर विशेष पोस्ट*
2016 को पहली बार पोस्ट किया था सोशल मीडिया पर 

~ मेरा अनुभूत “चर्मरोग नाशन महायोग"~

*नुस्खा इस प्रकार है*
*गंधक रसायन 100ग्राम*
*खदिर घनसत् 100ग्राम*
*मजिष्ठ घनसत् 100ग्राम*
*बाकुची चूर्ण 75ग्राम*
*चोबचीनी चूर्ण 50ग्राम*
*प्रवाल पिष्टी 25ग्राम* 
*व्याधिहर्ण रसायन 25ग्राम*
*स्वर्णमाक्षिक भस्म 25ग्राम*
*अरोग्यावर्धनी वटी 50ग्राम* 
*ताम्र भस्म 10ग्राम*

बनाने की विधि :- 
सबसे पहले व्याधिहर्ण रसायन को अच्छी तरह रगड़कर सुरमे की तरह बारीक कर लें , फिर ताम्र भस्म को मिला कर घोटें । फिर उसमें स्वर्णमाक्षिक भस्म, प्रवाल पिष्टी मिला कर घोटे , उसके बाद बाकी बची हुई दवा डालकर खूब घुटाई करें या मिक्सी में मिक्स कर लें । उसके बाद नीम के पत्तों का रस निकालकर उसमें घोटकर सुखाकर , फिर घीग्वार यानि ग्वारपाठा (Aloe vera ) रस में घुटाई करके जब गोली बनने योग हो जाए तो 500-500मिलीग्राम की गोलियाँ बना लें या सुखाकर 500-500मिलीग्राम के खाली कैपशूलों में भर लें । 

*खाने की विधि*
सुबह-दोपहर-शाम दो-दो कैपसूल या दो-दो गोलियाँ लें । 
रात को स्वादिष्ट विरेचन चूरन ½चम्मच गुनगुने पानी से लें । 
चाय ,गर्म मसाले , तेज मिर्च ,तली ,खट्टी चीजों का परहेज । मंगवाने हेतु संपर्क करे। ं

*सदैव आपका अपना*
*डाँ०अमनदीप सिंह चीमाँ,पंजाब*
*मोबाइल एण्ड वटसऐप 9915136138*

Sunday, September 4, 2022

देशी अनुभूत नुस्खे

मेरे अनुभूत आयुर्वेदिक नुस्खे 


|||| सर्व चर्म रोगहर्ता महायोग ||||
 || नुस्खा ||
@@@@@
घटक द्रव्य : पंचनिम्ब चूर्ण, गंधक रसायन 100-100 ग्राम, व्याधिहरण रसायन 25 ग्राम, प्रवालपिष्टी और आरोग्यवर्द्धिनी वटी 50-50 ग्राम, रजत भस्म 10 ग्राम। यह आप बढ़िया विस्वाशयोग फार्मेसी की ही लें । 

 || भावना द्रव ||
@@@@@@@
 सारिवा, मंजिष्ठा और चोपचीनी तीनों द्रव्य 100-100 ग्राम, वायविडंग, भृंगराज, खैर और कचनार- 50-50 ग्राम।
यह आप पंसारी ,जड़ी-बूटी विक्रेता से ही प्राप्त करें । 

|| निर्माण विधि ||
@@@@@@@@
 सब भावना द्रव्यों को जौकुट करके दो लीटर पानी में उबालें। जब 250 ग्राम पानी बचे तब उतारकर छान लें। ऊपर लिखे द्रव्यों में भावना द्रव्यों का पानी मिलाकर खरल में खूब घुटाई करें और सब द्रव्यों को एक जान करके मटर के आकार की गोलियाँ बनाकर सुखा लें। या कैपसूलों मे भर लें । 
  || मात्रा ||
@@@@@
 सुबह-शाम पानी के साथ 2-2 गोली या कैपसूल लें।

 ||लाभ ||
@@@@
 यह वटी रक्त विकार दूर करके चर्म रोगों को नष्ट करने की एक अत्यंत विश्वसनीय, सफल सिद्ध और श्रेष्ठ औषधि है। त्वचा में खुजली पैदा करने वाले कीटाणुओं को पोषण मिलना बन्द करने में इस वटी का जवाब नहीं। पोषण मिलना बंद होने पर इन कीटाणुओं का बल घटते-घटते समाप्त हो जाता है और व्याधि का शमन हो जाता है। एक्जीमा सूखा हो या गीला, इसके लगातार सेवन से ठीक हो जाता है। 

दूषित विष के उपद्रव स्वरूप उत्पन्न होने वाले कुष्ठ, पाचन विकार से या फिरंग रोग से उत्पन्न होने वाले कुष्ठ के अलावा भंगदर, श्लीपद, वातरक्त, नाड़ी व्रण, प्रमेह, रक्त विकार, सिर दर्द, मेदवृद्धि (मोटापा) आदि अनेक ऐसी व्याधियों को यह वटी ठीक करने में सफल सिद्ध हुई है, जिनके नाम भी आम व्यक्ति ने सुने न होंगे।

 किसी भी प्रकार से हुई शीतपित्ती या अन्य प्रकार की एलर्जी इस वटी के सेवन से ठीक हो जाती है। 
यह वटी रक्त विकार दूर करके चर्म रोगों को नष्ट करने की एक अत्यंत विश्वसनीय, सफल सिद्ध और श्रेष्ठ औषधि है। त्वचा में खुजली पैदा करने वाले कीटाणुओं को पोषण मिलना बन्द करने में इस वटी का जवाब नहीं। कुछ रोगों और कुछ रोगियों की अवस्था के अनुसार, अन्य औषधियों को भी इस वटी के साथ सेवन कराया जाता है। यह इस वटी का चमत्कार ही है कि अन्य औषधियों के साथ प्रमुख औषधि के रूप में इस वटी का सेवन कराने पर सोरायसिस जैसे कठिन साध्य और कई मामलों में असाध्य सिद्ध होने वाले रोग से ग्रस्त रोगियों को इस दुष्ट रोग से मुक्त किया जा सका है।

  || कुष्ठ रोग ||
@@@@@@
 त्वचा पर जगह-जगह सफेद दाग होना, लाल-लाल चकत्ते होना और ठीक ही न होना, पामा, दाद और कुष्ठ रोग का प्रभाव होना आदि शिकायतों को दूर करने के लिए।
 2-2 गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करना चाहिए।

  || परहेज ||
@@@@@
 मांसाहार, शराब, तेज मिर्च-मसाले, कच्चा दूध और भारी चिकने पदार्थों का सेवन बन्द रखना चाहिए। परहेज का पालन करते हुए यह प्रयोग करने पर धीरे-धीरे ये व्याधियाँ ठीक हो जाती हैं।

 रोगी को शक्कर, चावल, गाय का घी, केला, सेन्धा नमक, हलके सुपाच्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए। नमक, खट्टे पदार्थ, अरहर की दाल, अधिक चाय-कॉफी, तेज मिर्च-मसाले, बीड़ी-सिगरेट और सूर्य की तेज धूप इन सबका सेवन नहीं करना चाहिए या कम से कम करना चाहिए।


|| बहरापन दूर करने का तैल ||

|| आपका अपना ||
|| डाँ०अमनदीप सिंह चीमाँ,पंजाब ||
|| मोबाइल एण्ड वटसऐप 9915136138 ||

|| घटक ||
१.शहद 
२.अदरख का रस
३.सहिजन की जड़ की छाल का रस 
४. केले की जड़ का रस 
प्रत्येक १-१ सेर , तिल तैल १ सेर लेकर सबकी एकत्र मिलाकर पकावें । तैलमात्र शेष रहने पर उतार कर छान कर रख लें । 

||||| गुण और उपयोग |||||

कान में ज्यादा मैल जम जाने अथवा कान के छेद किसी कारण बन्द हो जाने अथवा सुनने की शक्ति कम हो जाने या सुनाई कम देने पर यह तैल बहुत उपयोगी है । कान की हर तरह की बिमारी में रामबाण की तरह कार्य करता है । रोगियों को बहुत लाभकारी सिद्ध होता है । यह तैल आप घर पर ही बनावें और बनाकर रख लेंवें बनें । 


       ° Night fall स्वप्नदोष एक गंभीर समस्या °
        ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
स्वप्न में मनी खलास हो जाना ।। होता क्या है कि गंदा स्वप्न आता है ,और अनमोल चीज शरीर से बाहर निकल जाती है , जिसे स्वप्नदोष कहा जाता है । महीने में एक - दो बार होने वाले स्वप्नदोष को रोग नही कहा जा सकता , इससे ज्यादा बार यह समस्या आएं तो इसका इलाज जरूर करना चाहिए। 

||कारण ||
ज्यादा गर्म ,खट्टे ,तली हुई चीजों का सेवन , कब्ज , Internet ,पोर्न फिल्में , गंदा साहित्य,गंदी संगत, अमलपित्त,वीर्य में गर्मी,पतलापन,हस्तमैथुन आदि मुख्य कारण है जिनकी वजह से रोग उत्पत्ति होती है ||

स्वप्नदोष नाशक एक अनुभूत योग लिख रहा हुँ जो कि आप लोग आसानी से आयुर्वेद सटोर से ले सकते है । 

||•स्वप्नदोष नाशक मेरा अनुभूत योग•||

गिलोय सत् 15ग्राम , 
जामुन बीज गिरी चूर्ण 150ग्राम,
प्रवाल पिष्टी 15 ग्राम ,
कुकतांडत्वक भस्म 15ग्राम ,
त्रिबंग भस्म 5ग्राम ,
मोती पिष्टी 3ग्राम ,
रजत भस्म 3ग्राम 

||•बनाने की विधि•||
यह सब दवा आप खरल में डालकर , घुटाई करके एक जान करलें ।फिर किसी शीशी में डाल कर सुरक्षित रख लेवें । 

||•मात्रा और सेवन विधि •||
जितनी दवा है । इसकी आप 60 पुडियाँ बनाकर रख लें । सुबह-शाम एक-एक पुडियाँ ताजे जल से खाने के 1घंटे बाद लें । 

||•लाभ•||
इसके सेवन से स्वप्नदोष मिट जाता है । वीर्य गाढ़ा होता है । हस्तमैथुन के कारण वीर्य ग्रंथियों में पढ़ी हुई गर्मी निकल जाती है । इसमें प्रवाल पिष्टी ,मोती,रजत भस्म,त्रिबंग आदि जैसी बहुमुल्य औष्धियाँ दिल-दिमाग को ताकत देकर शरीर की बढ़ी हुई गर्मी को कम करके दिल को ठंडक ,ताकत ,मन को शांति देती है । वीर्य की गर्मी को कम करके ,वीर्य को गाढ़ा और ताकतवर बनाती है । इसके 2माह सेवन से सिर्फ स्वप्नदोष ही ठीक नही होगा , शरीर के और भी विकार जो आपने अपनी ही गल्तियों से उत्पन्न किए हुए थे ,ठीक हो जाएगें । शरीर में ताकत आएगी ,मन में प्रसन्नता पैदा होगी । जीवन में नई उमंग ,उत्साह पैदा होगा । चेहरे पर आए तेज को देखकर आपको लोग पूछे बिना नही रहेगे कि आपकी सेहत का राज क्या है । 


||• मधुमेह नाशक काढ़ा •|| 

एक चमत्कारी,संन्यासी नुस्खा,अनुभूत,परीक्षित,सफल नुस्खा 
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इस फारमूले को बनाने की सावधानी यही है कि सारी दवा ताजा ही लेनी है ।

*नुस्खा लिख रहा हुँ ,जो इस प्रकार है*
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•नीम पत्र ताजा
•जामुन पत्र ताजा
•अमरूद पत्र ताजा 
•बेल पत्र ताजा
•आम पत्र ताजा 
•गुडमार बूटी 
 (गुडमार बूटी पंसारी से लें, ओर पाउडर बनाकर ही डालें)

बनाने का तरीका :- 
सबको सामान भाग यानि समभाग लेकर , अच्छी तरह धोकर , कूटकर चटनी जैसा बनाकर,किसी साफ मिट्टी के बर्तन मे डालकर, १६ गुना जल को डालकर धीमी आँच पर रख दें, जब पानी चोथाई हिस्सा रह जाए तब उतारकर, ठंडा होने पर , हाथों से मसलकर ,छानकर , निथारकर रख ले, दवा तैयार है|

*खाने का तरीका*
**************
सुबह खाली पेट 20-50 ml तक लें| बराबर जल मिलाकर ।

*परहेज जो जरूरी है*
*******************
चीनी , चाय, काफी , आलू , मेदा, डालडा घी बिल्कुल बंद कर दें|


•Diabities मधुमेह रोग को जड़ से खत्म कैसे करें? 

|| मधुमेह हर गोल्ड वटी ||

हमसे इसी नाम से मांगें। 

मधुमेह का जो नुस्खा आज इस लेख में लिख रहा हुं , 
यह योग मेरा अनुभूत है। हर समय तैयार रहता है। आयुर्वेद ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद इस दवा को बहुत मेहनत से तैयार किया है । इस नुस्खे की हर एक जड़ी - बूटी , भस्मों में मधुमेह को जड़ से खत्म करने के गुण समाएं हुए है। इस दवा का पूरा कोर्स करके आप सदा के लिए मधुमेह रोग से छुटकारा पा सकते है। यह नुस्खा पैंक्रियाज की गड़बड़ी को ठीक करके उसको सही ढंग से काम करने के लिए तैयार करता है , जिससे रोगी के शरीर में इंसुलिन बनने लग जाती है। बाहर से इन्सुलिन नही लेना पढ़ता । insulin की गोली सदा के लिए छूट जाती है। रोगी पूर्ण स्वस्थ होकर पहले की तरह तंदरुस्त जीवन , सुखमय जीवन बिता सकता है। 

• नुस्खा इस प्रकार है:- 

पनीर डोडी घनसत्व
नीम निबोली 
विजयसार घनसत्व,
मकोय घनसत्व, 
गुडमार घनसत्व, 
कुटकी घनसत्व, 
चिरायता घनसत्व,
आमला घनसत्व, 
गिलोय घनसत्व, 
गोरक्षमुंडी घनसत्व 50-50 ग्राम घनसत्व , 
नाग भस्म 100 पुट्टी , 
अभ्रक भस्म 100 पुटी , 
मोती पिष्टी ,
रजत भस्म ,
सिद्ध मकरध्वज 10-10 ग्राम 
स्वर्ण भस्म 5 ग्राम 

सबको मिलाकर घीग्वार ( Aloe vera ) ताजा गुदा में घोटकर गोलियां बना लें ।‌ एक दिन छाया में रखें । फिर अच्छी तरह धूप में सुखाकर , हवा बंद डिब्बे में रख लें। सुबह- शाम गोली दूध या गुनगुना पानी से ले। 

|| जय आयुर्वेद जय धन्वंतरि ||

नोट:- कोई भी दवा लेने से पहले अच्छे अनुभवी वैद्य से सलाह जरूर लें। देश-विदेश दवा भेजने की सुविधा है।

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आपका अपना शुभचिंतक
वैद्य अमनदीप सिंह चीमाँ
कोहिनूर आयुर्वेदा
मोबाइल & Whatsapp 
9915136138 


Monday, August 29, 2022

Mall Sindur मल्ल सिंदूर ਮੱਲ ਸੰਧੂਰ

मल्लसिन्दूर क्या है ? बनाने की विधि, लाभ, विस्तार सहित पोस्ट
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 शुद्ध संखिया 4 .5 तोला ,
शुद्ध पारद 9 तोला ,
शुद्ध गन्धक 5.5 तोला , 
रस कपूर 9 तोला  
स्वर्ण 
प्रथम पारा और गन्धक की कज्जली करें , पीछे उसमें रस कपूर और संखिया पृथक् पृथक् पीस कर मिला ग्वारपाठा ( घीकुमारी ) के रस में दो दिन मर्दन कर सात कपड़मिट्टी की हुई आतशी - शीशी में भर कर बालुकायन्त्र में 2 दिन पकावें । स्वांग - शीतल होने पर शीशी को तोड़कर शीशी के गले में जमे हुए मल्लसिन्दूर को निकाल तीन दिन पत्थर के खरल में पीस , खूब महीन होने पर शीशी में भर लें ।
 - सि . भै . म . माला 

★नोट - मल्लसिन्दूर बनाने में बहुत सावधानी की आवश्यकता है । प्रारम्भ में कूपीस्थ द्रव्यों के पिघलने तक मन्द अग्नि दें , बाद में तेज अग्नि दें । लोहे की सलाई से बराबर शीशी के गले को साफ करते रहें । जब तक शीशी में गन्धक रहेगा ; तब तक सलाई में गन्धक पिघला हुआ काले रंग का देखने में आयेगा । करीब 10-12 घन्टे में इस गन्धक का जारण हो जाता है । फिर संखिया का धुआँ निकलने लगता है । इसी समय डाट लगा दें अन्यथा संखिया सब निकल जायेगा । गन्धक रहते हुए यदि डाट लगा दी जाती है तो गन्धक की गैस बन कर डाट को फेंक देती है या शीशी को तोड़ डालती है । अतः डाट सावधानी से लगावें । साथ ही संखिया के धुआँ से भी बचना चाहिए । मल्लसिन्दूर के लिये 36 घण्टे की आँच पर्याप्त है । यदि मल्लसिन्दूर के योग में पारद से चतुर्थांश #स्वर्ण #वर्क मिलाकर बनाया जाय , तो इससे अधिक गुणकारी मल्लचन्द्रोदय बन जाता है । हम स्वर्ण डालकर बनाते है। 

★मात्रा और अनुपान - आधी रत्ती से 1 रत्ती , दिन में दो बार शहद और अदरक के रस के साथ या रोगानुसार अनुपान से दें । 

★गुण और उपयोग -संखिया और कज्जली का यह रासायनिक कल्प अत्यन्त तीक्ष्ण और उष्णवीर्य है । 
पित्त प्रधान रोगों में और पित्त प्रकृति के पुरुषों को यह बहुत हल्की मात्रा में सौम्य औषध सितोपलादि चूर्ण, प्रवाल पिष्टी आदि के मिश्रण के साथ देना चाहिए और ठण्डा उपचार करना चाहिए । 
वात और कफ के विकारों में यह तीर की तरह शरीर में प्रवेश कर शीघ्र ही उत्तम फल दिखलाना है । जन्तुग्न गुण के कारण रक्त में घुसे हुए मलेरिया , हैजा , गरमी ( सिफलिस ) आदि के कीटाणुओं को जल्दी नष्ट करता है । यह रक्तवाहिकाओं में उत्तेजना पैदा करना है और हृदय की गति को बढ़ाता है । तेज बुखार में इसे नहीं देना चाहिए । आतशक के लिये तो इसे न्यूसल्वर्सन इन्जेक्शन ही समझें । आतशक या सूजाक के कारण होने वाले गठिया तथा अन्य उपद्रवों में भी बहुत शीघ्र लाभ देखा गया है । पक्षाघात , आमवात धनुष्टंकार आदि वात रोगों में और कफ - सम्बन्धी कास , श्वास , न्यूमोनिया , उरस्तोय , डब्बा आदि रोगों में आशातीत लाभ करता है । शीतांग और कफ प्रधान सन्निपात में यह अपूर्व प्रभाव दिखलाता है । स्त्रियों के हिस्टीरिया रोग में इसका बहुत जल्दी प्रभाव पड़ता है । एक सप्ताह में ही सब दौरे समाप्त हो जाते हैं । बुढ़ापे की दुर्बलता और पुराने दमे के रोग में मल्लसिन्दूर अमृत के समान गुण करता है । यह पाचक रस को पैदा करके भूख पैदा करता है और मूत्राशय तथा शुक्रप्रणालियों की कमजोरी को दूर करके रक्त उत्पन्न करता है । हस्तमैथुन से नामर्द हुए मनुष्य को इसे अवश्य सेवन करना चाहिए । हैजे और अजीर्ण जन्य दस्तों के विष को यह जल्दी नष्ट करता है । वात , कफजन्य प्रमेह में यह रसायन अच्छा गुण दिखलाता है । अतः केवल बल - वीर्य वृद्धि के लिये भी इसका सेवन किया जाता है । यह थोड़े ही दिनों में शरीर को पुष्ट बनाकर मैथुन शक्ति को बढ़ा देता है । इसको प्रवालपिष्टी जैसी सौम्य औषध के साथ मिलाकर खिलाने से ज्यादा गर्मी नहीं मालूम होती है । कफजन्य सन्निपात में मल्लसिन्दूर का प्रयोग किया जाता है । सन्निपात की प्रारम्भिक अवस्था में इसका प्रयोग करने से सन्निपात की शक्ति कम हो जाती है तथा रोगी भी विशेष परेशान नहीं होता । कफ प्रकोप के कारण कंठ में कफ भरा हुआ रहता हो , घर्र घर्र आवाज होती है , साथ ही थोड़ा कफ भी निकलता हो , अधखुले नेत्र , अक - बक बकना , तन्द्रा , बेहोशी , कभी - कभी निद्रा आ जाना , ज्वर की गर्मी भी ज्यादा न मालूम पड़े - ऐसी अवस्था में मल्लसिन्दूर मधु के साथ देने बहुत फायदा करता है । दूषित जलवायु या कफकारक पदार्थ का विशेष सेवन करने से कफ प्रकुपित हो छाती में संचित होने लगता है । कफसंचित होने से फुफ्फुस और वातवाहिनी नाड़ी कमजोर हो जाती है , जिससे कफ जल्दी बाहर नहीं निकल पाता । फुफ्फुस की कमजोरी के कारण खाँसने में भी कष्ट होता है । ऐसी हालत में मल्लसिन्दूर के प्रयोग से संचित कफ बाहर निकलने लगता है । मल्लसिन्दूर के साथ प्रवाल चन्द्रपुटी या अभ्रक तथा लौह भस्म आदि भी मिलाकर देने से बहुत फायदा होता है । न्यूमोनिया या इन्फ्लुएंजा आदि रोगों में जिनका असर खास कर फुफ्फस पर पड़ता है , ऐसे रोगों से मनुष्य जब ग्रस्त हो जाता है , तब फुफ्फुसों की कमजोरी के कारण श्वास लेने में भी कष्ट होता है और रोगी इतना कमजोर हो जाता है कि वह देर तक बातें भी नहीं कर सकता तथा उसका हृदय भी कमजोर हो जाता है । ऐसी दशा में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती , मोती भस्म या पिष्टी 1 रत्ती , लौह भस्म 1 रत्ती- इन्हें मधु या पान के रस में मिलाकर देने से लाभ होता है । मलेरिया ( विषम ज्वर ) में मधु और तुलसी पत्ती के रस के साथ दें । आतशक और सूजाकजन्य वात विकारों में मंजिष्ठादि क्वाथ या सारिवादि हिम और मधु के साथ दें । पक्षाघात आदि विकारों में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती मधु के साथ दें । ऊपर से महारास्नादि क्वाथ 5 तोला मधु मिलाकर पिला दें । प्रमेह और बहुमूत्र में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती , बंग भस्म 1 रत्ती मधु के साथ दें । शुक्रक्षय में मल्लसिन्दूर आधी में रत्ती , छोटी इलायची चूर्ण 4 रत्ती 2 माशे मिश्री में मिला दूध के साथ दें । आतशक और उसके विकारों में मल्लसिन्दूर आधी रत्ती मधु में मिलाकर चटा दें । ऊपर से सारिवाद्यासव 2 तोला बराबर पानी मिलाकर देना चाहिए । न्यूमोनिया , इन्फ्लुएंजा आदि रोगों में श्रृंगभस्म या गोदन्ती भस्म में मिलाकर पान के रस और मधु के साथ दें ।
आ.सा.सं.ग्ं

यह पोस्ट आपकी जानकारी के लिए है। अनजान इसे न बनाएं। किसी सिद्ध हस्त अनुभवी वैद्य से प्राप्त करके उनके मार्गदर्शन में ही सेवन करें। 

#मल्लसिंदूर #mallsindhur #ayurveda #healthylifestyle #VaidAmanCheema #DrAmandeepSinghCheema #KohinoorAyurveda #स्वर्ण #gold 

आपका अपना शुभचिंतक
डाँ० अमनदीप सिंह चीमाँ वैद्य
Whatsapp & Mobile
99151-36138

Saturday, August 20, 2022

*महाराजा तिला* लिंग मोटा , लंबा , ताकतवर बनाने के लिए

👉 *महाराजा तिला* 💪🏻
*पारा, आमलासार गंधक, हरताल,केसर,घुघची, संखिया, मीठा तेलिया 5-5 ग्राम , कुकतांड पीतता 10नग , दूध मदार 5 ग्राम , रेशम का कपड़ा, तिल तैल यथावश्यक। 

👉 *विधि तैयार करने की* ✍🏻

सब औष्धियों को तिल तैल में घोटकर मोठ के दाने के समान गोलियां बनाकर भलीभांति सुखालें। फिर उन गोलियों को आतशी शीशी में डालकर तैल निकाल लें। आगदान के तोबरे में लकड़ी के चूरे अथवा मीगनियों की आंच दें। फिर तैल को शीशी में डालकर भूमि के अन्दर दबा दें। अथवा प्रचंड धूप में घर की छत पर ध्यानपूर्वक रखें। जब गाढ़ा पन आ जाए तो समझें तैयार है। सुपारी, सीवन को छोड़कर मर्दन करें। बंगला पान या एरण्ड का कोमल पत्ता या पट्टी लपेट दिया करें। फिर प्रभु की लीला देखें। 

 *मंगवाने के लिए संपर्क कर सकते है।*
*आपका अपना शुभचिंतक*
*Vaid Aman Cheema*
*Whatsapp 9915136138*

Thursday, August 4, 2022

Brahm kamal ब्राह्म कमल

Brahm Kamal “ब्राह्म कमल” देवतों को चढ़ाया जाने वाला फूल 

Flower of Uttrakhand State  . उत्तराखण्ड के लोग इसे “ब्राह्म कमल” कहते है। इस के नाम के बारे काफी मतभेद है।

location Hemkunt Sahib ( Uttrakhand )

( मेरे द्वारा पहली बार 04-08-17 को  पोस्ट की गई ) 

ब्रह्म कमल ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय, उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है। धार्मिक और प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्म कमल को इसका नाम उत्पत्ति के देवता ब्रह्मा के नाम पर मिला है। ब्रह्म कमल एक रहस्यपूर्ण सफेद कमल है ,जो हिमालय में 11 हजार से 17 हजार फुट की ऊंचाइयों पर पाया जाता है।  उत्तराखंड में यह विशेषतौर पर पिण्डारी से लेकर चिफला, सप्तशृंग , रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ तक के आसपास के क्षेत्र में यह स्वाभाविक रूप से पाया जाता है।  केदारनाथ और बद्रीनाथ के मंदिरों में  ब्रह्म कमल चढ़ाने की परंपरा है।  

यह अत्यंत सुंदर  चमकते सितारे जैसा आकार लिए मादक सुगंध वाला पुष्प है। ब्रह्म कमल को हिमालयी फूलों का सम्राट भी कहा गया है। यह कमल आधी रात के बाद खिलता है इसलिए इसे खिलते देखना स्वप्न समान ही है।  एक विश्वास है कि अगर इसे खिलते समय देख कर कोई कामना की जाए तो अतिशीघ्र पूरी हो जाती है। ब्रह्मकमल के पौधे में एक साल में केवल एक बार ही फूल आता है जो कि सिर्फ रात्रि में ही खिलता है। दुर्लभता के इस गुण के कारण से ब्रह्म कमल को शुभ माना जाता है। 

इस पुष्प की मादक सुगंध का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है जिसने द्रौपदी को इसे पाने के लिए व्याकुल कर दिया था। राज्य पुष्प ब्रह्म कमल बदरीनाथ, रुद्रनाथ, केदारनाथ, कल्पेश्वर आदि ऊच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। किवदंति है कि जब भगवान विष्णु हिमालय क्षेत्र में आए तो उन्होंने भोलेनाथ को 1000 ब्रह्म कमल चढ़ाए, जिनमें से एक पुष्प कम हो गया था। तब विष्णु भगवान ने पुष्प के रुप में अपनी एक आंख भोलेनाथ को समर्पित कर दी थी। तभी से भोलेनाथ का एक नाम कमलेश्वर और विष्णु भगवान का नाम कमल नयन पड़ा। हिमालय क्षेत्र में इन दिनों जगह-जगह ब्रह्म कमल खिलने शुरु हो गए हैं। 

ब्रह्म कमल पुष्प के पीछे हुआ था भीम का गर्व चूर - जब द्रोपदी ने भीम से हिमालय क्षेत्र से ब्रह्म कमल लाने की जिद्द की तो भीम बदरीकाश्रम पहुंचे। लेकिन बदरीनाथ से तीन किमी पीछे हनुमान चट्टी में हनुमान जी ने भीम को आगे जाने से रोक दिया। हनुमान ने अपनी पूंछ को रास्ते में फैला दिया था। जिसे उठाने में भीम असमर्थ रहा। यहीं पर हनुमान ने भीम का गर्व चूर किया था। बाद में भीम हनुमान जी से आज्ञा लेकर ही बदरीकाश्रम से ब्रह्म कमल लेकर गए।

ब्रह्म कमल के औषधीय गुण - ससोरिया ओबिलाटा वानस्पतिक नाम वाला ब्रह्म कमल औषधीय गुणों से भी परिपूर्ण है। इसे सुखाकर कैंसर रोग की दवा के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। इससे निकलने वाले पानी को पीने से थकान मिट जाती है। साथ ही पुरानी खांसी भी काबू हो जाती है। भोटिया जनजाति के लोग गांव में रोग-व्याधि न हो, इसके लिए इस पुष्प को घर के दरवाजों पर लटका देते हैं। इस फूल की विशेषता यह है कि जब यह खिलता है तो इसमें ब्रह्म देव तथा त्रिशूल की आकृति बन कर उभर आती है। गौर हो कि इस फूल का वानस्पतिक नाम एपीथायलम ओक्सीपेटालम है तथा इस फूल का प्रयोग जड़ी-बूटी के रूप में किया जाता है। ब्रह्म कमल न तो खरीदा जाना चाहिए और न ही इसे बेचा जाता है। 

बस इसे उपहार स्वरूप ही प्राप्त किया जाता है, क्योंकि इसे देवताओं का प्रिय पुष्प माना गया है और इसमें जादुई प्रभाव भी होता है।  इस दुर्लभ पुष्प की प्राप्ति आसानी से नहीं होती। हिमालय में खिलने वाला यह पुष्प देवताओं के आशीर्वाद सरीखा है । यह साल में एक ही बार जुलाई-सितंबर के बीच खिलता है और एक ही रात रहता है। इसका खिलना देर रात आरंभ होता है तथा दस से ग्यारह बजे तक यह पूरा खिल जाता है। मध्य रात्रि से इसका बंद होना शुरू हो जाता है और सुबह तक यह मुरझा चुका होता है। इसकी सुगंध प्रिय होती है और इसकी पंखुडियों से टपका जल अमृत समान होता है। भाग्यशाली व्यक्ति ही इसे खिलते हुए देखते हैं और यह उन्हें सुख-समृद्धि से भर देता है। ब्रह्म कमल का खिलना एक अनोखी घटना है। 

यह अकेला ऐेसा कमल है जो रात में खिलता है और सुबह होते ही मुरझा जाता है। सुगंध आकार और रंग में यह अद्भुत है। भाग्योदय की सूचना देने वाला यह पुष्प पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह बर्फ से ढका हिमालयी क्षेत्र देवताओं का निवास माना जाता है उसी तरह बर्फीले क्षेत्र में खिलने वाले इस फूल को भी देवपुष्प मान लिया गया है। नंदा अष्टमी के दिन देवता पर चढ़े ये फूल प्रसाद रूप में बांटे जाते हैं। मानसून के मौसम में जब यह ऊंचाइयों पर खिलता है  
तो स्थानीय लोग चरागाहों में जाकर इन्हें बोरों में भर कर लाते हैं और मंदिरों में देते हैं। मंदिर में यही फूल चढ़ाने के बाद प्रसाद रूप में वितरित किए जाते हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ के क्षेत्र में मौसम के दौरान पूरे वैभव और गरिमा के साथ इन्हें खिले हुए देखा जा सकता है। वनस्पति विज्ञानियों ने ब्रह्मकमल की 31 प्रजातियां दर्ज की हैं। कहा जाता है कि आम तौर पर फूल सूर्यास्त के बाद नहीं खिलते, पर ब्रह्म कमल एक ऐसा फूल है जिसे खिलने के लिए सूर्य के अस्त होने का इंतजार करना पड़ता है। धार्मिक मान्यता - ब्रह्म कमल अर्थात ब्रह्मा का कमल, यह फूल माँ नन्दा का प्रिय पुष्प है, इसलिए इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोडने के भी सख्त नियम होते हैं। जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है। इससे बुरी आत्माओं को भगाया जाता है। ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है। यह फूल अगस्त के समय में खिलता है और सितम्बर-अक्टूबर के समय में इसमें फल बनने लगते हैं। इसका जीवन 5-6 माह का होता है।

नोट:- यह तस्वीर दिन में लिया गया है , लेकिन मान्यता अनुसार  रात को खिलता हे , यह भ्रम ही है।

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